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रोजाना एक कविता : आज पढ़ें कवि प्रमोद पवैया की कविता विदुर विलाप

तुमने जिन पर फूल चढ़ाए
चंपा, जूही और चमेली
हमको उन्हें देवता कहने तक में पश्चाताप हुआ

सभागृहों में बैठे हैं जो
प्रमुख पदों पर, तिलक लगाकर
भाग्यवान तुम समझ रहे हो
खुद को जिनके पांव दबाकर

और उन्हीं का चरणामृत पी
तपा रहे हो भले हथेली
लेकिन हमको उन लोगों का दर्शन ही अभिशाप हुआ

निश्चित है यह तुम्हें अंत में
अनुदानों की भीख मिलेगी
किंतु हमें भी दुत्कारों से
मिलने वाली सीख मिलेगी

तुम पाओगे सुख, कुंठाएं
हम पाएंगे नई नवेली
क्योंकि हमसे सही पक्ष में रहने वाला पाप हुआ

सामर्थ्यों के दुरुपयोग की
प्रथा तुम्हारा हित करती है
पर चरित्र की लचक, लोक की
आशा रीढ़रहित करती है

चलो बधाई तुम्हें, हमारी
पीड़ा फिर रह गयी अकेली
खत्म इसी के साथ हमारा फिर से विदुर-विलाप हुआ

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