
मेघा पटैरिया
मुंबई : (Mumbai) इतिहास में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो मंच के बीचोंबीच दिखाई नहीं देते, लेकिन उनके फैसले आने वाली पीढ़ियों का भविष्य तय कर देते हैं। 1991 में जब भारत गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था, विदेशी मुद्रा भंडार लगभग समाप्त होने की स्थिति में था और दुनिया भारत की आर्थिक स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लगा रही थी, तब रिजर्व बैंक गवर्नर एस. वेंकिटरमणन ने ऐसे निर्णय लिए जिनके लिए असाधारण साहस, दूरदृष्टि और आत्मविश्वास की आवश्यकता थी। देश का सोना गिरवी रखने जैसा फैसला लोकप्रिय नहीं था, लेकिन उन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों को समझते हुए राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। आज आर्थिक सुधारों की जिस यात्रा की चर्चा होती है, उसकी बुनियाद रखने वालों में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।
इसी शांत, दृढ़ और दूरदर्शी व्यक्तित्व को अभिनेता मनोज बाजपेयी फिल्म ‘गवर्नर’ में पर्दे पर जीवंत कर रहे हैं। 12 जून को रिलीज होने वाली यह फिल्म केवल आर्थिक संकट की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की कहानी है जिसने आलोचनाओं और जोखिमों के बीच खड़े होकर देश के लिए कठिन फैसले लेने का साहस दिखाया। फिल्म, किरदार, तैयारी, निर्देशन, पुरस्कार और दर्शकों से जुड़ाव जैसे विषयों पर मनोज बाजपेयी से हुई विशेष बातचीत के प्रमुख अंश—
प्रश्न : एस. वेंकिटरमणन के फैसलों को आप कितना साहसी मानते हैं?
मनोज बाजपेयी : मैं उन्हें केवल साहसी नहीं, बल्कि बेहद जिम्मेदार व्यक्ति मानता हूं। संकट के समय बहुत लोग समस्या को देखते हैं, लेकिन कुछ ही लोग समाधान की दिशा में कठिन कदम उठाने का साहस जुटा पाते हैं। वेंकिटरमणन ऐसे ही व्यक्ति थे। उन्होंने लोकप्रिय होने के बजाय सही निर्णय लेने को प्राथमिकता दी। मुझे लगता है कि उनका सबसे बड़ा गुण यह था कि वह परिस्थितियों से विचलित नहीं हुए और देशहित को सबसे ऊपर रखा।
प्रश्न : क्या उस समय राजनीतिक नेतृत्व को साथ लाना भी बड़ी चुनौती रही होगी?
मनोज बाजपेयी : बिल्कुल। देश का सोना गिरवी रखना केवल आर्थिक विषय नहीं था, उससे लोगों की भावनाएं भी जुड़ी थीं। ऐसे समय में किसी भी निर्णय के लिए सहमति बनाना आसान नहीं होता। लेकिन वेंकिटरमणन की विशेषता यही थी कि वे भावनात्मक दबाव से ऊपर उठकर वास्तविकता को देखते थे। उन्होंने समझा कि तत्काल कठिन निर्णय ही भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं।
प्रश्न : इस किरदार ने आपको व्यक्तिगत रूप से कितना प्रभावित किया?
मनोज बाजपेयी : बहुत ज्यादा। हम अक्सर उन लोगों को याद रखते हैं जो मंच पर दिखाई देते हैं, लेकिन कई बार असली नायक पर्दे के पीछे होते हैं। वेंकिटरमणन का जीवन मुझे इसलिए प्रभावित करता है क्योंकि उन्होंने अपने काम को प्रचार का माध्यम नहीं बनाया। उन्होंने अपना कर्तव्य निभाया और देश को प्राथमिकता दी। ऐसे व्यक्तित्व आज भी प्रेरणा देते हैं।

प्रश्न : भाषा और बोलने के अंदाज पर आपने कैसे काम किया?
मनोज बाजपेयी : यह सबसे कठिन पहलुओं में से एक था। हमें यह दिखाना था कि वह दक्षिण भारत से आते हैं, लेकिन साथ ही एक उच्च शिक्षित प्रशासक और वैश्विक दृष्टि रखने वाले व्यक्ति भी हैं। उनके व्यक्तित्व में गंभीरता और विनम्रता दोनों थीं। इसलिए केवल उच्चारण ही नहीं, बल्कि उनके बोलने की गति, ठहराव और सोचने के तरीके को भी समझना जरूरी था।
प्रश्न : किरदार के लिए कैसी तैयारी करनी पड़ी?
मनोज बाजपेयी : तैयारी कई स्तरों पर हुई। मैंने उनके बारे में उपलब्ध सामग्री पढ़ी, उस दौर के आर्थिक संकट को समझने की कोशिश की और यह जानने का प्रयास किया कि उस समय उनकी मानसिक स्थिति क्या रही होगी। मुझे लगता है कि किसी भी किरदार को समझने के लिए उसके निर्णयों के पीछे की मनःस्थिति को समझना जरूरी होता है। वेंकिटरमणन का संयम और आत्मविश्वास ही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान थी।
प्रश्न : उनके व्यक्तित्व का सबसे चुनौतीपूर्ण पहलू क्या लगा?
मनोज बाजपेयी : उनका शांत स्वभाव। पर्दे पर गुस्सा दिखाना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन बिना शोर किए अपनी मजबूती दिखाना कठिन होता है। वेंकिटरमणन ऐसे व्यक्ति थे जो बहुत कम शब्दों में बड़ी बात कह देते थे। उनकी आंतरिक दृढ़ता को पकड़ना मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी।
प्रश्न : इतने अलग-अलग किरदार निभाने के बाद भी क्या लगता है कि बहुत कुछ बाकी है?
मनोज बाजपेयी : हमेशा। मुझे तो सड़क पर चलता हर आदमी एक कहानी लगता है। बस स्टॉप पर खड़ा व्यक्ति हो, किसी चाय की दुकान पर बैठा आदमी हो या किसी दफ्तर में काम करने वाला कर्मचारी, हर किसी के भीतर एक दुनिया होती है। एक अभिनेता के लिए सीखने और समझने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती।
प्रश्न : निर्देशक चिन्मय मांडलेकर इस फिल्म से कैसे जुड़े?
मनोज बाजपेयी : यह कहानी मुझे कई वर्ष पहले मिली थी और मुझे बहुत पसंद आई थी। लेकिन मन में यह सवाल भी था कि अर्थव्यवस्था जैसे विषय को दर्शकों तक रोचक तरीके से कैसे पहुंचाया जाए। बाद में मैंने चिन्मय का नाम सुझाया। उन्होंने इस विषय पर गहन शोध किया और कहानी को केवल आर्थिक घटनाओं तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसके पीछे मौजूद मानवीय पक्ष को भी सामने लाया।

प्रश्न : क्या फिल्मों की जिम्मेदारी है कि वे समाज और इतिहास की कहानियां सामने लाएं?
मनोज बाजपेयी : मैं इसे जिम्मेदारी के बजाय एक रचनात्मक चुनाव मानता हूं। लेकिन मेरा अनुभव कहता है कि दर्शक सच्ची कहानियों से हमेशा जुड़ते हैं। जब किसी फिल्म में वास्तविक जीवन की संवेदनाएं और संघर्ष दिखाई देते हैं, तो वह लोगों के दिल तक पहुंचती है।
प्रश्न : क्या कभी पूरी फिल्म का दबाव अपने ऊपर महसूस होता है?
मनोज बाजपेयी : मेरा ध्यान हमेशा अपने काम पर रहता है। मैं केवल यह सोचता हूं कि जिस किरदार को निभा रहा हूं, उसके साथ न्याय कर पाऊं या नहीं। हर नई फिल्म मेरे लिए एक नई परीक्षा होती है। मैं हमेशा कोशिश करता हूं कि दर्शकों को कुछ नया दूं और खुद को दोहराने से बचूं।
प्रश्न : क्या यह फिल्म आम दर्शकों को अर्थशास्त्र समझाने में मदद करेगी?
मनोज बाजपेयी : मुझे लगता है कि यह फिल्म लोगों को यह जरूर समझाएगी कि आर्थिक फैसले केवल कागजों पर नहीं होते। उनके प्रभाव सीधे हमारे जीवन तक पहुंचते हैं। हमारी नौकरी, व्यापार, बचत और रोजमर्रा की जिंदगी पर उन निर्णयों का असर पड़ता है। यह फिल्म उसी संबंध को समझाने का प्रयास करती है।
प्रश्न : 2024 में जो सोना वापस लाया गया, उसे कैसे देखते हैं?
मनोज बाजपेयी : सरकारें समय-समय पर ऐसे कदम उठाती रहती हैं। लेकिन मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण वह क्षण है जब संकट के समय किसी ने कठिन निर्णय लेने का साहस दिखाया। इतिहास में वही क्षण सबसे ज्यादा मायने रखते हैं क्योंकि वे भविष्य की दिशा बदलते हैं।
प्रश्न : एक अभिनेता-निर्देशक के साथ काम करने का क्या लाभ होता है?
मनोज बाजपेयी : बहुत बड़ा लाभ होता है। एक अभिनेता जानता है कि कैमरे के सामने खड़ा कलाकार किन मानसिक और भावनात्मक चुनौतियों से गुजर रहा है। चिन्मय इस बात को बहुत अच्छी तरह समझते हैं। इसलिए उनके साथ काम करते समय संवाद और विश्वास दोनों मजबूत रहते हैं।

प्रश्न : ‘डिस्पैच’ जैसी फिल्में करने का आकर्षण क्या है?
मनोज बाजपेयी : मेरे लिए हमेशा कहानी सबसे महत्वपूर्ण रही है। अगर कहानी मजबूत है और किरदार में गहराई है तो मैं उसकी ओर आकर्षित होता हूं। ऐसी फिल्में अभिनेता को कुछ नया करने का अवसर देती हैं।
प्रश्न : इतने पुरस्कार मिलने के बाद क्या दबाव बढ़ जाता है?
मनोज बाजपेयी : पुरस्कार खुशी देते हैं, लेकिन बहुत थोड़े समय के लिए। अगले दिन जब आप सेट पर पहुंचते हैं तो वहां केवल आपका काम मायने रखता है। कैमरे के सामने पुरस्कार नहीं, आपकी तैयारी और ईमानदारी काम आती है।
प्रश्न : दर्शकों से क्या कहना चाहेंगे?
मनोज बाजपेयी : मैं हमेशा मानता हूं कि किसी फिल्म की सबसे बड़ी सफलता उसके बॉक्स ऑफिस आंकड़े नहीं, बल्कि दर्शकों के मन में छोड़ा गया प्रभाव होता है। मेरी कोशिश रहती है कि कहानी पूरी सच्चाई के साथ लोगों तक पहुंचे। अगर दर्शक फिल्म देखकर कुछ महसूस करें, कुछ सीखें या किसी किरदार को अपने साथ लेकर जाएं, तो वही मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।


