
नई दिल्ली : (New Delhi) सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि कम शैक्षणिक योग्यता वाले पद के लिए अपनी उच्च शिक्षा छिपाकर नौकरी हासिल करना न केवल अनुचित है, बल्कि उस पद के वास्तविक पात्र उम्मीदवार के अधिकारों का हनन भी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी नियुक्तियां कानून की नजर में वैध नहीं मानी जा सकतीं।
ग्रेजुएशन छिपाकर ली नौकरी, हाई कोर्ट का फैसला पलटा
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन (Justice Ahsanuddin Amanullah and Justice R. Mahadevan) की पीठ ने मद्रास हाई कोर्ट के 2025 के एक फैसले को रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने सिंडिकेट बैंक में अटेंडेंट पद पाने के लिए अपनी स्नातक डिग्री छिपाने वाले व्यक्ति के पक्ष में फैसला दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उम्मीदवार द्वारा जानबूझकर तथ्य छिपाना नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्षता के खिलाफ है।
कम पढ़े-लिखे उम्मीदवारों के अवसरों की रक्षा जरूरी
अदालत ने कहा कि कम योग्यता वाले पदों पर अधिक शिक्षित उम्मीदवारों को प्राथमिकता मिलने से कम पढ़े-लिखे लोगों के रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं। इसलिए सरकार द्वारा कुछ पदों को विशेष शैक्षणिक योग्यता तक सीमित रखना पूरी तरह न्यायसंगत और संवैधानिक है। कोर्ट ने अपने पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सार्वजनिक रोजगार निर्धारित नियमों और पात्रता के आधार पर ही दिया जाना चाहिए।
CBSE के थ्री-लैंग्वेज रूल की होगी न्यायिक जांच
इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई की कक्षा 9 में लागू किए जा रहे थ्री-लैंग्वेज रूल (‘Three-Language Rule’) को लेकर भी चिंता जताई है। 27 मई की सुनवाई में अदालत ने कहा कि यह जांचना जरूरी है कि नई व्यवस्था छात्रों और स्कूलों पर अनावश्यक बोझ तो नहीं डाल रही। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (Chief Justice Surya Kant) की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि शिक्षकों और पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता जैसी जमीनी चुनौतियों का भी आकलन किया जाएगा।
TET पास करना शिक्षकों के लिए अनिवार्य
सुप्रीम कोर्ट ने 30 मई को दिए एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में दोहराया कि स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों के लिए टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) (Teacher Eligibility Test) पास करना अनिवार्य होगा। हालांकि अदालत ने टीईटी उत्तीर्ण करने की समयसीमा 31 अगस्त 2027 से बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि इसके बाद कोई अतिरिक्त समय नहीं दिया जाएगा।
20 लाख से अधिक शिक्षकों पर पड़ेगा असर
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन (Justice Dipankar Datta and Justice Manmohan) की पीठ ने इस मामले में दायर 65 से अधिक पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया। ये याचिकाएं विभिन्न राज्य सरकारों, शिक्षक संगठनों और व्यक्तिगत शिक्षकों की ओर से दाखिल की गई थीं। अदालत ने कहा कि बिना टीईटी योग्यता वाले शिक्षकों का सेवा में बने रहना शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। इस फैसले का असर देशभर के 20 लाख से अधिक शिक्षकों पर पड़ने की संभावना है।


