
मुस्लिम आरक्षण पर महाराष्ट्र सरकार का हाईकोर्ट में जवाब
मुंबई : (Mumbai) महाराष्ट्र में मुस्लिम समुदाय (Muslim community in Maharashtra) के 5 प्रतिशत आरक्षण को लेकर कानूनी जंग एक बार फिर बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) की दहलीज पर है। राज्य की देवेंद्र फडणवीस सरकार (Devendra Fadnavis government) ने कोर्ट में अपना पक्ष साफ करते हुए कहा है कि मुस्लिम आरक्षण कोई नई कटौती नहीं है, बल्कि यह कानूनी रूप से 2014 में ही खत्म हो चुका था।
मामला समझें
महाराष्ट्र सरकार ने 17 फरवरी 2025 को एक सरकारी प्रस्ताव (GR) (Government Resolution) जारी किया। इसके तहत मुस्लिम समुदाय को ‘स्पेशल बैकवर्ड कैटेगरी A’ (‘Special Backward Category A’) में रखने वाले 2014 के सभी पुराने आदेशों और सर्कुलर को रद्द कर दिया गया। साथ ही, समुदाय को दिए जाने वाले जाति और नॉन-क्रीमी लेयर सर्टिफिकेट की प्रक्रिया भी बंद कर दी गई। सामाजिक न्याय विभाग ने हलफनामे में स्पष्ट किया कि 2014 का जो अध्यादेश था, वह दिसंबर 2014 में ही खुद-ब-खुद खत्म हो गया था क्योंकि उसे कभी विधानसभा से पारित कराकर कानून नहीं बनाया गया। सरकार का कहना है कि जब आरक्षण कानूनी रूप से अस्तित्व में ही नहीं था, तो उसे ‘खत्म’ करने का आरोप निराधार है। सरकार ने कोर्ट में तर्क दिया कि भारतीय संविधान सिर्फ धर्म के आधार पर आरक्षण देने की अनुमति नहीं देता। मुस्लिम समुदाय को केवल उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर विशेष श्रेणी में रखना असंवैधानिक होगा। सरकार ने याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए ‘नस्लीय भेदभाव’ (‘racial discrimination’) के आरोपों को पूरी तरह गलत और बेबुनियाद बताया।
नस्लीय भेदभाव का आरोप
वकील सैयद एजाज नकवी अपनी याचिका में सरकार के इस फैसले को संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताया है। उनका तर्क है कि यह मुस्लिम समुदाय के साथ किया गया भेदभाव है और यह उन्हें शिक्षा व नौकरियों के अवसरों से वंचित करता है। उन्होंने कोर्ट से 17 फरवरी के आदेश को रद्द करने की मांग की है।


