
‘श्री यथार्थ परमार्थ सेवा समिति’ का अनूठा प्रयास, बदलते दौर में नैतिक शिक्षा पर जोर
कल्याण : (Kalyan) आधुनिक जीवनशैली और तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच नई पीढ़ी जहां तेजी से डिजिटल दुनिया की ओर आकर्षित हो रही है, वहीं ‘श्री यथार्थ परमार्थ सेवा समिति’ (Shri Yatharth Parmarth Seva Samiti) गांव-गांव जाकर बच्चों और युवाओं को धर्म, संस्कार और नैतिक मूल्यों से जोड़ने का एक संतुलित और सराहनीय अभियान चला रही है।
पिछले तीन वर्षों से समिति देशभर के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में निःशुल्क धर्मशास्त्र का ज्ञान देने के साथ-साथ धार्मिक पुस्तकों का वितरण भी कर रही है। इस पहल का उद्देश्य बच्चों में बचपन से ही सही-गलत की समझ, सहिष्णुता और नैतिक मूल्यों का विकास करना है, ताकि वे जिम्मेदार नागरिक बन सकें।
बच्चे ही राष्ट्र की नींव
कल्याण पूर्व स्थित प्रभुराम नगर के परमहंस आश्रम (Paramhansa Ashram in Prabhuram Nagar) में बातचीत के दौरान संत विमलानंद जी ने कहा “बच्चे देश की असली नींव हैं। यदि भारत को मजबूत बनाना है, तो आने वाली पीढ़ी को संस्कारवान बनाना आवश्यक है।”
उन्होंने यह भी कहा कि भारत संसाधनों के मामले में समृद्ध है, लेकिन समाज में सोच और मूल्यों के स्तर पर संतुलन बनाए रखना जरूरी है। उनके अनुसार, आध्यात्मिक परंपराएं आज भी प्रासंगिक हैं, परंतु बदलती जीवनशैली में लोग उनसे दूर होते जा रहे हैं।
5000 बच्चों तक पहुंचा अभियान
समिति के अनुसार, अब तक देश के विभिन्न राज्यों में करीब 5000 बच्चों तक यह धर्मज्ञान अभियान पहुंच चुका है। मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में भी संस्था सक्रिय रूप से कार्य कर रही है, जहां बच्चों को नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा देने के प्रयास किए जा रहे हैं । समिति का लक्ष्य जनसहयोग से इस अभियान को और विस्तार देना है, ताकि अधिक से अधिक गांवों और बच्चों तक इसकी पहुंच हो सके।
धर्मग्रंथों के अध्ययन पर जोर
अभियान के तहत बच्चों को श्रीमद्भगवद गीता, रामचरितमानस, बाल गीता और महापुरुषों की जीवनी का अध्ययन कराया जा रहा है। समिति का मानना है कि ये ग्रंथ केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि जीवन मूल्यों और आचरण को भी दिशा प्रदान करते हैं।
बदलते समय में संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि आज के समय में बच्चों का अधिक समय मोबाइल और इंटरनेट पर बीत रहा है, ऐसे में नैतिक शिक्षा का महत्व और भी बढ़ गया है। हालांकि, शिक्षा के आधुनिक साधनों के साथ-साथ पारंपरिक मूल्यों का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है, ताकि बच्चे सर्वांगीण विकास कर सकें।
समाज से सहयोग की अपील
संत विमलानंद जी (Sant Vimalanand Ji) ने समाज से अपील करते हुए कहा कि बच्चों को संस्कार और नैतिक शिक्षा देना केवल संस्थाओं का ही नहीं, बल्कि परिवार और समाज का भी दायित्व है। उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे बच्चों के साथ समय बिताएं और उन्हें अच्छे मूल्यों के प्रति प्रेरित करें।


