उदयपुर:(Udaipur) हर बिटिया मां भगवती का अवतार है। मां भगवती जब भी अवतरित होती है तो उनके आवरण की व्यवस्था प्रकृति स्वयं करती है। मां भगवती स्वयं प्रकृति हैं। प्रकृति निष्कपट है। प्रकृति को खंडित करने का परिणाम धृष्टता करने वाले को भुगतना ही पड़ता है।
यह बात दिगंबर खुशाल भारती महाराज ने यहां बलीचा स्थित बरबड़ेश्वर महादेव मंदिर प्रांगण में चल रहे सनातनी चातुर्मास के दौरान विभिन्न समाजों के प्रतिनिधियों से आध्यात्मिक चर्चा में कही। उन्होंने कहा कि सिर्फ मां भगवती के सम्मान में की गई धृष्टता ही नहीं, अपितु प्रकृति के पंच तत्व के विरुद्ध जाकर की गई किसी भी तरह की धृष्टता को भी प्रकृति क्षमा नहीं करती है।
उन्होंने कहा कि पांच तत्वों में इतनी ताकत है कि पहाड़ की ढलान पर भी पल्लवित हुआ पौधा स्थिर रहता है। क्योंकि उसे प्रकृति ने पल्लवित किया है इसलिए वह भी जीवित रहेगा और जिस पहाड़ पर व पल्लवित हो रहा है उस पहाड़ को भी संतुलित रखेगा। लेकिन जब इस पौधे या पहाड़ को खंडित करने की बात होती है तब हिमाचल उत्तराखंड जैसी आपदाएं मानव पर आती हैं। उन्होंने संदेश दिया कि मानव को प्रकृति के पंच तत्वों के साथ कोई भी धृष्टता नहीं करनी चाहिए।
संन्यासी जीवन धारण करने पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मानव जीवन कई पुण्य कर्मों के बाद मिलता है और संन्यासी जीवन उनसे भी लाख गुना अधिक पुण्य कर्मों के बाद नसीब होता है, और संन्यासी बनना मानव का निर्णय नहीं होता, प्रकृति के पंच भूत स्वयं संन्यासी के पात्र को चुनते हैं।
उन्होंने कहा कि प्राणी अपने प्रारब्ध के पाप पुण्य को साथ लेकर आता है। यहां मानव जीवन में यदि उसे सकारात्मक वातावरण मिलता है तो वह सदमार्ग पर चल पड़ता है और उसके पुण्य कर्म मजबूत होते जाते हैं। वहीं, दूसरी ओर यदि उसकी संगति नकारात्मक कार्यों की ओर चली जाती है तो उस पर पाप कर्म ज्यादा हावी हो जाते हैं। हमारे यहां कहा गया है व्यक्ति पर संगत का असर होता है, ऐसे में व्यक्ति को सत्संग की संगति करनी चाहिए।
उन्होंने कहा यदि किसी के मन में यह भाव आ जाते हैं कि किसी के लिए मैं यह कर रहा हूं, तो यह सिर्फ उसका मतिभ्रम है। करने और कराने वाला परमात्मा है, हम सिर्फ माध्यम मात्र हैं।
सनातनी चातुर्मास में चल रही शिव महापुराण कथा में विभिन्न प्रसंगों का वर्णन करते हुए कथा व्यास सुशील महाराज ने कहा कि कुसंग का जोर सबसे भारी होता है। ”प्रभुता पाए मद नाहीं” उक्ति को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में जब व्यक्ति का प्रभुत्व बढ़ जाए तब उसे और भी विनम्र हो जाना चाहिए। व्यक्ति को अहंकार नहीं पालना चाहिए। अहंकार का मार्ग नाश का द्वार है।


