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Prayagraj : एक बार निरस्त होने के बाद उन्हीं आधारों पर दोबारा पुनर्विलोकन अर्जी पोषणीय नहीं : हाईकोर्ट

न्यायिक प्रक्रिया के दुरूपयोग पर यूनियन बैंक पर लगा 50 हजार रुपये हर्जाना

प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी फैसले के खिलाफ पुनर्विलोकन अर्जी निरस्त होने के बाद उन्हीं आधारों पर दोबारा दाखिल अर्जी पोषणीय नहीं है। निरस्त होने के बाद उन्हीं आधारों पर दोबारा पुनर्विलोकन अर्जी दाखिल करना कानूनी एवं न्यायिक प्रक्रिया का दुरूपयोग है।

इसी के साथ कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया का दुरूपयोग करने के लिए बैंक पर 50 हजार रुपये हर्जाना लगाया है और एक माह में हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति में जमा करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति वीके बिड़ला तथा न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की खंडपीठ ने यूनियन बैंक आफ इंडिया मेरठ की अर्जी को खारिज करते हुए दिया है।

मालूम हो कि बैंक ने एडीएम वित्त मेरठ के समक्ष भूमि पर वास्तविक कब्जा दिलाने की अर्जी दी। 30 अक्टूबर 2019 को अर्जी खारिज कर दी गई। जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका निस्तारित कर दी कि सरफेसी एक्ट की धारा 17 मे डीआरटी में वाद दायर करने का वैकल्पिक अधिकार प्राप्त है।

इस आदेश के पुनर्विलोकन की अर्जी दी गई। कहा गया कि पट्टा धारक, लोन धारक, गारंटर या किरायेदार को डीआरटी जाने का अधिकार है। किंतु यह अधिकार सिक्योर क्रेडीटर को नहीं है। हाईकोर्ट भी सुनवाई कर सकता है। वैकल्पिक उपचार क्षेत्राधिकार को पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं किया गया है। कोर्ट ने अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद उन्हीं आधारों पर दोबारा अर्जी दाखिल की थी। कोर्ट ने भारी हर्जाने के साथ अर्जी खारिज कर दी और कहा कि एक माह में हर्जाना हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति में जमा किया जाये।

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