
मैं वही हूं, जो मैं हूं
महान जर्मन साहित्यकार फ्रांज काफ्का और फेलिस बोअर का प्रणय-संबंध काफी लंबा चला था। दो बार उनकी सगाई भी हुई, लेकिन दोनों बार काफ्का आखिरी समय में पीछे हट गया। उसे डर लगता था कि शायद फेलिस उसके साथ खुश नहीं रह पाएगी। 1917 तक उसे अपनी टी.बी. के बारे में पता चल चुका था। उसके बाद उसने इस संबंध को हमेशा के लिए खत्म कर दिया।
11 नवंबर, 1812
अतिप्रिय फेलिस,
अब मैं तुमसे ऐसा अनुरोध करने जा रहा हूं, जो तुम्हें बहुत अजीब लगेगा और जो मुझे भी बड़ा अजीब लगता अगर पत्र पाने वाला मैं ख़ुद होता। साथ ही यह एक तरह की महान परीक्षा भी है, जो किसी नरम दिल वाले व्यक्ति के सामने रखी जा सकती है। तो वह अनुरोध यह है- मुझे हफ्ते में सिर्फ एक बार लिखो, ताकि तुम्हारा पत्र रविवार को मेरे पास पहुंचे – क्योंकि मैं रोज-रोज के तुम्हारे पत्र बर्दाश्त नहीं कर सकता, मुझमें उन्हें बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं है। उदाहरण के लिए जैसे ही मैं तुम्हारे किसी पत्र का जवाब पूरा करता हूं, मैं बिस्तर पर शांत लेट जाता हूं। पर मेरा दिल बहुत तेजी से धड़कता रहता है और मैं तुम्हारे अलावा और कुछ सोच ही नहीं पाता। मैं तुम्हारा हूं, इसे किसी और तरह अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता, और यह भी कोई संपूर्ण अभिव्यक्ति नहीं है और इसी कारण से मैं यह जानना नहीं चाहता कि तुमने क्या पहन रखा है, इससे मैं इतना विचलित हो जाता हूं कि जिंदगी पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो जाता है, इसीलिए मैं यह भी जानना नहीं चाहता कि तुम मुझे कितना चाहती हो।
अगर मैं जान जाऊं तो जिस तरह का बेवकूफ में हूं, मेरे लिए यहां ऑफिस में या घर में बैठना मुश्किल हो जाता है। इच्छा होती है कि सीधा जाकर ट्रेन में बैठ जाऊं और तभी आंखें खोलूं जब मेरे सामने तुम हो। पर अफसोस। संक्षेप में कहूं तो मेरा स्वास्थ्य ख़ुद मेरे लायक अच्छा नहीं है, विवाह के लायक अच्छा नहीं है, पितृत्व के लायक होने की तो बात ही बहुत दूर है। फिर भी, जब मैं तुम्हारा पत्र पढ़ता हूं तो मुझे लगता है कि उसे नजरअंदाज किया जा सकता है, जिसे नजरअंदाज करना असंभव है।
कितना अच्छा होता, अगर मुझे अभी तुम्हारा जवाब मिल जाता! कितनी यातना दे रहा हूं मैं तुम्हें, अपने कमरे की तनहाई में यह पत्र पढ़ने के लिए बाध्य करके। ऐसा कमबख्त पत्र शायद ही कभी उस कमरे में पहुंचा हो! सच, कई बार मुझे वाकई ऐसा लगता है कि मैं किसी कीट की तरह तुम्हारे मधुर नाम को खाए जा रहा हूं। क्या होता अगर शनिवार वाला वह पत्र भी मैंने तुम्हें भेज दिया होता, जिसमें मैने तुमसे कभी भी पत्र न लिखने का अनुरोध किया था और ख़ुद भी यहीं वायदा किया था।
हे ईश्वर किस चीज ने मुझे वह पत्र भेजने से रोक लिया? सब ठीक हो जाएगा। पर क्या अब एक शांतिपूर्ण समाधान संभव है? क्या इससे कुछ मदद मिलेगी अगर हम हफ्ते में सिर्फ एक बार एक-दूसरे को लिखें? नहीं, अगर इन तरीकों से मेरी बीमारी ठीक होनी होती, तो वह इतनी गंभीर न होती और अब अभी से मुझे लग रहा है कि में रविवार के पत्र भी झेल नहीं पाऊंगा, इसलिए शनिवार वाले पत्र के खोए मौके के एवज में और अपनी बची हुई तमाम ऊर्जा के साथ, मैं इस पत्र के आखिर में कहना चाहूंगा- अगर हमारे लिए हमारी जिंदगियों का कुछ मूल्य है, तो हमें यह सब बंद कर देना चाहिए। कहीं मैं अपने नाम की जगह एक-दूसरा नाम लिखने की तो नहीं सोच रहा था? नहीं, इससे बड़ा झूठ कुछ और नहीं हो सकता। नहीं, मैं हमेशा के लिए अपने साथ बंधा हुआ हूं, मैं वहीं हूं जो मैं हूं और मुझे इसी के साथ जीने की कोशिश करनी है।
फ्रांज


