जम्मू : श्रीकैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत रोहित शास्त्री ‘ज्योतिषाचार्य’ ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलाधिपति पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित महाराज डॉ. कर्ण सिंह से कर्ण महल श्रीनगर में मुलाकात कर, उन्हें ट्रस्ट की वार्षिक पत्रिका कर्तव्य मार्ग भेंट की और कहा कि जम्मू-कश्मीर राज्य में संस्कृत संस्थाओं की कमी के कारण संस्कृत-छात्रों को पर्याप्त अवसर तथा सुविधाएँ नहीं मिल पा रही हैं। इसमें भी विशेषतः साम्बा,विजयपुर आदि दूरदराज इलाकों के छात्रों को तो संस्कृत अध्ययन का यह सुअवसर एक स्वप्न जैसा हो गया है। जिसका एक प्रमुख कारण जम्मू कश्मीर का सबसे प्राचीन श्री रघुनाथ संस्कृत महाविद्यालय वीरपुर है। उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (पहले राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान) नई दिल्ली, जो कि संस्कृत भाषा के लिए शिक्षा मन्त्रालय, भारत सरकार की नोडल एजेंसी है, इसके विभिन्न उद्देश्यों में यह उद्देश्य भी सम्मिलित है कि यह विश्वविद्यालय भारत के स्तरीय संस्कृत विद्यालयों/ गुरुकुलों/ पाठशालाओं को मान्यता एवं वित्तीय सहायता उपलब्ध कराएगा। इसके तहत मान्यता प्राप्त आदर्श संस्कृत महाविद्यालय की समस्त वित्तीय आवश्यकताओं की आपूर्त्ति का 95 प्रतिशत इसी के द्वारा अनुदानित होता है।
इस विश्वविद्यालय से सम्बद्ध वित्तपोषित आदर्श संस्कृत महाविद्यालय बिहार में पाँच, उत्तरप्रदेश में तीन, हिमालय प्रदेश में दो, पश्चिम बंगाल में दो, हरियाणा में दो, तमिलनाडु में दो, मणिपुर में दो तथा अन्य कुछ राज्यों में एक-एक हैं, जिन्हें इस विश्वविद्यालय के माध्यम से शिक्षा मन्त्रालय, भारत सरकार आर्थिक सहयोग प्रदान करता है किन्तु यह विचारणीय विषय है कि जम्मू-कश्मीर राज्य में अब तक एक भी संस्कृत संस्था को वित्तपोषित “आदर्श संस्कृत महाविद्यालय” का दर्जा़ प्राप्त नहीं हुआ है। अतः श्री धर्मार्थ ट्रस्ट ,वीरपुर, जम्मू द्वारा संचालित, शैक्षणिक एवं भौतिक संसाधनों से युक्त, वीरपुर में स्थित “श्री रघुनाथ संस्कृत महाविद्यालय” को “आदर्श संस्कृत महाविद्यालय” की मान्यता प्रदान की जानी चाहिए। जिससे धर्मार्थ ट्रस्ट को आर्थिक राहत तो मिलेगी ही साथ ही जम्मू-कश्मीर राज्य के संस्कृतानुरागियों को भी इसका ज्ञानात्मक प्रचुर लाभ होगा। अतः यदि श्री रघुनाथ संस्कृत महाविद्यालय वीरपुर को आदर्श संस्कृत महाविद्यालय का दर्जा प्राप्त हो, तो प्रदेश में विलुप्त हुए संस्कृत धर्म दर्शन की पुनर्प्रतिष्ठा सम्भव है।


