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इस अपूर्ण जग में

इस अपूर्ण जग में कब किसने
प्रिय, तेरा रहस्य पहचाना?
क्यों न हाथ फिर मेरा काँपे
छू माला का अंतिम दाना?

कवि : अज्ञेय

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