जागो फिर एक बार!प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हेंअरुण-पंख तरुण-किरणखड़ी खोलती है द्वार-जागो फिर एक बार!
आँखे अलियों-सीकिस मधु की गलियों में फँसी,बन्द कर...
अरुण लाल
क्या तुम नहीं चाहतीकि मैं लिखूं कविता तुम्हारे लिएझांकू तुम्हारे मन मेंखोल कर रख दूं तुम्हारा मन तुम्हारे सामने
क्या तुम नहीं चाहतीकि मैं बताऊं...