
वीरेन्द्र खरे ‘अकेला’
ये कौन सा तरीक़ा अपनाया जा रहा है।
दे दे के चोट हम को सहलाया जा रहा है।
जनतंत्र की सफलता सत्ता ने की सुनिश्चित,
आलोचकों को जमकर धमकाया जा रहा है।
भूखों को चैन से अब मरना तो हो मयस्सर,
रोटी दिखा दिखा कर तड़पाया जा रहा है।
दे कर यही हिदायत-निकले न चीख मुँह से,
हमको गरम तवे पर बैठाया जा रहा है।
सरकार को न कोसो, जाओगे नर्क में तुम,
सुनते हैं स्वर्ग धरती पर लाया जा रहा है।
उपहार उनसे पाकर ख़ुश थे, कहाँ पता था,
ख़ाली लिफ़ाफ़ा हमको पकड़ाया जा रहा है।
माथे पे राम जी का लेबल तो है दिखावा,
रावण का आचरण ही अपनाया जा रहा है।
मरना पड़ेगा, इससे ज़्यादा तो कुछ न होगा,
तू ऐ ‘अकेला’ नाहक़ घबराया जा रहा है।


