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रोजाना एक कविता : आज पढ़ें पराग मांदले की कविता ‘मुक्त’

चाहे उसे
भाग्य कहते हों
या संयोग,
मगर उसकी खुरदुरी इबारतें
उभरी हुई रहती हैं
मेरी संवेदनाओं के पटल पर
निरंतर,
इसीलिए जानती हूँ मैं
कि हथेली में मचलती मछली-से
फिसल जाओगे
तुम एक दिन।
शायद यही वजह है
कि लिखना चाहती हूँ
तुम्हें मैं,
रचकर
देना चाहती हूँ
शब्दों की काया,
ताकि
एकाकीपन की
बेकल उदास सदियों को
तुम्हारे होने के अहसास से
भर सकूं,
स्मृतियों के
पीले पड़ते जाने वाले पन्नों पर
देख सकूं,
छू सकूं,
महसूस कर सकूं तुम्हें बार-बार
मेरे प्यार!
अनुपस्थिति
विरह से उपजे
या कि मरण से,
एक-सी होती है।
मैं तुम्हें रचकर
तुम्हारी कायिक उपस्थिति की
अनिवार्यता से
तुम्हें मुक्त करती हूँ।

कवि : पराग मांदले

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