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Varanasi : भारतीय ज्ञान परंपरा के ज्ञान तत्व को जनमानस के सामने लाएं संस्कृत के विद्वान: डॉ कृष्ण गोपाल

आरएसएस के सह सरकार्यवाह सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में पहुंचे, विद्वत विचार मंथन में हुए शामिल

वाराणसी : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सह सरकार्यवाह डॉ कृष्णगोपाल ने भारतीय ज्ञान परंपरा के ज्ञान तत्व को जनमानस के सामने लाने पर बल दिया है। उन्होंने कहा कि व्याकरण के क्षेत्र में पाणिनी और पतंजली (अष्टाध्यायी और महाभाष्य के लेखक) के समतुल्य पूरे विश्व भर में कोई दूसरा नहीं है। खगोलशास्त्र और गणित के क्षेत्र में आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कर के कार्यों ने मानव जगत को नवीन मार्ग दिखाया। वहीं, औषधि के क्षेत्र में चरक और सुश्रुत ने महत्वपूर्ण कार्य किया।

सह सरकार्यवाह डॉ कृष्णगोपाल गुरुवार को सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के योगसाधना केंद्र में आयोजित विद्वत विचार मंथन को सम्बोधित कर रहे थे। विश्वविद्यालय के वरिष्ठ आचार्यों संग विमर्श के दौरान डॉ कृष्ण गोपाल ने कहा कि संस्कृत भाषा में वैदिक साहित्य के अतिरिक्त भी अन्य सभी विद्याओं तथा ज्ञान-विज्ञान का बहुत सूक्ष्म अध्ययन उपलब्ध है। संस्कृत हमारे दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, गणितज्ञों, कवियों, नाटककारों, व्याकरण आचार्यों आदि की भाषा थी। संस्कृति का अर्थ है परिमार्जित संस्कारों से युक्त मनुष्यों की सभ्यता। हमारी आत्मा, अस्मिता, भारत की भारतीयता उसकी संस्कृति में है, जिसका प्राण संस्कृत भाषा में है। उन्होंने कहा कि आज इसी मंथन पर यहाँ के विद्वानों एवं विशेषज्ञों को कार्य करने की जरूरत है। देवभाषा का विश्वविद्यालय शोध व ‘स्व’आधारित सत्य को सामने लायेगा।

डॉ कृष्ण गोपाल ने विश्वविद्यालय के सरस्वती भवन पुस्तकालय में संरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों का अवलोकन किया। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के द्वारा कराए जा रहे संरक्षण के कार्यो भी देखा। इस दौरान उन्होंने इसके संरक्षण के साथ-साथ इस पर शोध कर नवीन ज्ञान तत्व को तैयार करने को भी कहा।

मंथन में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि संस्कृत भाषा की एक प्रमुख विशेषता य़ह है कि वह व्यष्टि से समष्टि को जोड़ती है। उसकी प्रत्येक प्रार्थना में विश्व बंधुत्व की भावना व्याप्त है। विपुल ज्ञान भंडार संस्कृत में है, इसे देश की प्रगति और मानवता के कल्याण के लिए उपयोग में लाया जाएगा। भारतीय ज्ञान परंपरा हमे प्रकृति से जोड़ती है, प्रकृति की शक्तियों को पहचानकर उसी धारा में चलने की जरूरत है।

-सरस्वती भवन पुस्तकालय में संरक्षित दुर्लभ पांडुलिपि की विशेषता

सरस्वती भवन पुस्तकालय में संरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों में श्रीमद्भागवतम् (पुराण) संवत-1181 देश की प्राचीनतम कागज आधारित पाण्डुलिपि, भगवद्गीता – स्वर्णाक्षरों में लिपि, दुर्गासप्तशती कपड़े के फीते पर दो इन्च चौड़ाई रील में अतिसूक्ष्म (संवत 1885 मैग्नीफाइड ग्लास से देखा जा सकता है), रासपंचाध्यायी (सचित्र)- पुराणोतिहास विषय से युक्त-देवनागरी लिपि (स्वर्णाक्षर युक्त) इसमें श्रीकृष्ण जी के सूक्ष्म चित्रण निहित, कमवाचा (त्रिपिटक पर अंश), वर्मी लिपि- लाख पत्र पर स्वर्ण पॉलिश, ऋग्वेद संहिता भाष्यम इसके साथ ही लाह, भोजपत्र, कपड़ा काष्ठ सहित कागज पर लिपिबद्ध पांडुलिपियां शामिल हैं।

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