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बुद्ध पूर्णिमा विशेष : वर्तमान ‘सुख से जीने का एकमात्र मंत्र’

बुद्ध की सभा चल रही थी और सब उन्हें मंत्र-मुग्ध से सुन रहे थे। सभा समाप्त होने पर उनसे प्रभावित एक धनिक  ने बुद्ध के निकट आकर कहा- ‘प्रभु, आप जैसा ओजस्वी और तपस्वी इस पृथ्वी पर न कभी था, न है और न कभी होगा!’

बुद्ध बोले- ‘वत्स, क्या तुम इतना ज्ञान प्राप्त कर चुके हो कि अतीत में कितने महापुरुष हुए हैं, यह जान सको। और क्या तुम इतना विचरण कर चुके हो कि मुझसे बढ़कर तुम्हें कोई और नहीं मिला और भविष्य का तुम्हें अभी से इतना ज्ञान हो गया है।’

धनिक क्षमा मांगने लगा तो बुद्ध बोले- ‘वत्स, संसार में सुख से जीने का एकमात्र मंत्र बस यही है— अतीत और भविष्य को भुलाकर वर्तमान में जीना सीखो।’

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