
हरिवंशराय बच्चन
ऊंटों का घर रेगिस्तान
फैला बालू का मैदान ।
वहां नहीं जाती है घास,
पानी नहीं, लगे यदि प्यास ।
कहीं-कहीं बस उग आती है
छोटी झाड़ी काँटे-दार,
भूख लगे तो ऊँटराम को
खाना पड़ता हो लाचार ।
चलते – चलते दो ऊँटों ने
आपस में की एक सलाह;
कहा एक ने चलें बम्बई ।
कहा दूसरे ने भई वाह!
चलते – चलते चलते – चलते
दोनो’ पहुँचे सागर – तीर;
लोग देखकर उनको बोले
इनका कैसा अजब शरीर ।
छोटा-सा सिर, लम्बी गर्दन,
लम्बी टाँगें? उचकल चाल ।
नन्ही-सी दुम, पीठ तिकोनी,
सब तन पर बादामी बाल ।
देख जानवर यह अजूबा ।
सूखा लोगों को खिलवाड़ ।
खूब रहेगा जो खिंचवाएं ”
इनसे गाड़ी पहिएदार ।
‘अब जुत गाड़ी में ऊँटराम’
रहे खींचते इस-उस ओर,
लद गाड़ी में नौ-दस बच्चे
हंसते, गाते, करते शोर ।


