
हरिवंश राय बच्चन एक भारतीय कवि थे। उनका जन्म 27 नवंबर 1907 में हुआ था। वे 20वीं शताब्दी के शुरुआती हिंदी साहित्य के नई कविता साहित्यिक आंदोलन (रोमांटिक उत्थान) के लेखक थे। वे हिंदी कवि सम्मेलन के कवि भी थे। वे अपने शुरुआती काम “मधुशाला” के लिए सबसे ज्यादा जाने जाते हैं। 1976 में उन्हें हिंदी साहित्य में उनकी सेवा के लिए पद्म भूषण मिला था। 18 जनवरी 2003 में उनका देहांत हुआ।
कभी फूलों की तरह मत जीना, जिस दिन खिलोंगे बिखर जाओंगे, जीना हैं तो पत्थर बन के जियो,किसी दिन तराशे गए तो खुदा बन जाओंगे। आज अपने ख़्वाब को मैं सच बनाना चाहता हूं, दूर की इस कल्पना के पास जाना चाहता हूं। असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो, क्या कमी रह गई देखो और सुधार करो, जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम, संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम, कुछ किए बिना ही जय जयकार नहीं होती कोशिश करनेवालों की हर नहीं होती। जो बीत गई सो बात गई। गिरना भी अच्छा होता है, औकात का पता चलता है। समझदार इंसान का दिमाग ज्यादा चलता है और मूर्ख इंसान का जुबान ज्यादा चलता है। स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो, सत्य का भी ज्ञान कर ले । पूर्ण चलने के बटोही , बाट की पहचान कर ले। बैठ जाता हूं मिट्टी पर अक्सर क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है, मैंने समन्दर से सीखा हैं, जीने का सलीका, चुपचाप से रहना और मौज में रहना। मैं छुपाना जानता, तो जग मुझे साधु समझता, शत्रु मेरा बन गया है छल रहित व्यवहार मेरा। प्यार किसी को करना, लेकिन कहकर उसे बताना क्या अपने को अर्पण करना पर औरों को अपनाना क्या। नफ़रतों का असर देखो, जानवरों का बंटवारा हो गया, गाय हिन्दू हो गई, और बकरा मुसलमान हो गया। तू न थकेंगा कभी, तू न थमेंगा कभी, तू न मुड़ेगा कभी, कर शपथ कर शपथ कर शपथ, अग्निपथ अग्निपथ, अग्निपथ।


