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छत्रपति शिवाजी: एक महान विचार और कर्म

अगर मनुष्य के पास आत्मबल है, तो वो सारी दुनिया के दिल में अपने कर्म की ध्वनि से किस तरह शाश्वत जगह बना सकता है, छत्रपति शिवाजी का जीवन इसकी जीती जागती मिसाल है। मराठा साम्राज्य के संस्थापक और अनंत उत्साह के निर्झर छत्रपति शिवाजी को शिवाजी राजे भोसले के नाम से भी जाना जाता है।

 19 फरवरी 1630 को मराठा कुर्मी जाति के शाहजी भोसले और जीजा बाई के घर एक दीपक प्रदीप्त हुआ। बालक का नाम भगवान शिव के नाम पर शिवाजी रखा गया। जब शिवाजी जन्मे तब उनके पिता पुणे के निकट जुन्नर नगर के पास शिवनेरी दुर्ग में एक सहायक के रूप में नियुक्त थे। माता जीजाबाई उनकी पहली मित्र और गुरू बनी जिनसे उनको निष्ठा, मेहनत, लगन, समर्पण, खुद्दारी विरासत में मिली और मार्गदर्शक संरक्षक दादा कोणदेव के सानिध्य में उन्हें सभी तरह की राजनीतिक, कूटनीतिक बातें सीखने को मिलीं। दादा कोणदेव ने किशोर शिवा को सामयिक युद्ध आदि विधाओं में भी निपुण बनाया था। 
शिवाजी बहुमुखी प्रतिभा पुंज थे। वो राजनीतिक होने के साथ आध्यात्मिक भावों से भी भरे हुए थे। उनके गुरू समर्थ गुरु रामदास ने अपनी साधना, प्रेरणा और चिंतन के द्वारा युवक शिवाजी की राजनीतिक चेतना में आध्यात्मिकता का जो समन्वय किया, वह अभूतपूर्व था। महाराष्ट्र में उन्हें शक्ति का पुंज मानकर पूजा जाता है। समर्थ गुरु रामदास ने अपने संदेशों द्वारा संत सम्मत शासन-परम्परा का शुद्ध तथा परम निर्मल स्वरूप समझकर शिवीजी की दृष्टि को और पैना किया। जिन दिनों छत्रपति शिवाजी महाराज महाराष्ट्र में स्वराज स्थापित कर रहे थे। समर्थ रामदास ने जन-जन के बीच मानवीय दूत के रूप में मराठा समाज में सर्वत्र शांति, सुकून और समृद्धि की स्थापना का संदेश दिया। 
उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज से कहा- ‘मराठों को एकत्र कीजिए। धर्म को फिर जीवित कीजिए।’ उन्होंने समाज में फैलाई जा रही वैमनस्यता का विरोध किया। राजसत्ता द्वारा उत्पन्न की ज रही सामाजिक-आध्यात्मिक दूरियों को पैदा होने से रोका। मराठा साम्राज्य संभालते ही शिवाजी ने बिना एक पल गंवाये लोक कल्याण के काम आरंभ कर दिये। प्रजा उनके लिए कुटुंब समान थी। शिवाजी ने भू-राजस्व एवं प्रशासन के क्षेत्र में अनेक कदम उठाए। राजस्व व्यवस्था के मामले में अन्य शासकों की तुलना में शिवाजी ने एक आदर्श व्यवस्था बनाई। शिवाजी ने राजस्व व्यवस्था को लेकर एक सही मानक इकाई बनाया था जिसके अनुसार रस्सी के माप के स्थान पर काठी और मानक छड़ी का प्रयोग आरंभ करवाया। यह व्यवस्था काफी सुगम थी, जबकि बीजापुर के सुल्तान, मुगल और यहां तक कि स्वयं मराठा सरदार भी अतिरिक्त उत्पादन को एक साथ ही लेते थे जो इजारेदारी या राजस्व कृषि की कुख्यात प्रथा जैसी ही व्यवस्था थी। शिवाजी ने अपने प्रशासनिक सुधार में भूराजस्व विभाग से बिचौलियों का अस्तित्व समाप्त कर दिया था। कृषकों को नियमित रूप से बीज और पशु खरीदने के लिए ऋण दिया जाता था, जिसे दो या चार वार्षिक किश्तों में वसूल किया जाता था। अकाल या फसल खराब होने की आपात स्थिति में उदारतापूर्वक अनुदान एवं सहायता प्रदान की जाती थी। नए क्षेत्र बसाने को प्रोत्साहन देने के लिए किसानों को लगानमुक्त भूमि प्रदान की जाती थी । 
शिवाजी महाराज के समय जमींदारी प्रथा प्रचलित थी पर शिवाजी ने इसे न्यूनतम किया और समानता पर जोर दिया। 
किसानों को आत्मसम्मान से जीने की आजादी 
शिवाजी के समय किसान को जमींदार से भयमुक्त होकर आत्मसम्मान के साथ जीने की आजादी मिली। उनके द्वारा भूमि एवं उपज के सर्वेक्षण और भूस्वामी बिचौलियों की स्वतंत्र गतिविधियों पर नियंत्रण लगाए जाने से ऐसी संभावना के संकेत मिलते हैं कि उन्होंने जमीदारी प्रथा को समाप्त करने के लिए बेहद काम किए थे। 
दिन हो या रात किसी भी पहर वो प्रजा के लिए सेवा भाव से तत्पर रहते। मोती, विश्वास, गजरा, रणवीर, कृष्णा, तुरंगी, इंद्रायणी यह उनके सात घोड़े थे, जिन्होंने शिवा को वीर और महान बनाने में अपनी पूरी वफादारी दिखाई। 

फुले ने की शिवाजी जयंती मनाने की शुरुआत
छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती मनाने की शुरुआत वर्ष 1870 में पुणे में महात्मा ज्योतिराव फुले द्वारा की गई थी। उन्होंने ही पुणे से लगभग 100 किलोमीटर दूर रायगढ़ में शिवाजी महाराज की समाधि की खोज की थी। बाद में स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने जयंती मनाने की परंपरा को आगे बढ़ाया और उनके योगदान पर प्रकाश डालते हुए शिवाजी महाराज की छवि को और भी लोकप्रिय बनाया। उन्होंने ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ खड़े होकर शिवाजी महाराज जयंती के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोगों को एक साथ लाने में अहम भूमिका निभाई थी। उनका वीरता और योगदान हमेशा लोगों को हिम्मत देता रहे, इसीलिए हर साल यह जयंती मनाई जाती है। 
मुस्लिम सैनिकों की नियुक्ति 
आज सारी दुनिया मे छत्रपति शिवाजी महाराज को उनके अद्भुत बुद्धिबल के लिए जाना जाता है। वह पहले भारतीय शासकों में से एक थे, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र की रक्षा के लिए नौसेना बल की अवधारणा को पेश किया था। इसके अलावा उनकी सामंजस्य क्षमता की सबसे खास बात ये है कि उन्होंने अपनी बटालियन में कई मुस्लिम सैनिकों को भी नियुक्त किया था। 
छत्रपति शिवाजी महाराज एक ऐसे अनुशासनप्रिय योद्धा थे, जिन्होंने सशक्त साम्राज्य खड़ा किया था। इसीलिए उन्हें सर्वसम्मति से एक अग्रगण्य वीर एवं अमर स्वतंत्रता-सेनानी स्वीकार किया जाता है। वीर शिवाजी राष्ट्रीयता के जीवंत प्रतीक एवं परिचायक थे। इसी कारण निकट अतीत के राष्ट्रपुरुषों में महाराणा प्रताप के साथ-साथ इनकी भी गणना की जाती है। 
महान राजा 
छत्रपति शिवाजी महाराज निर्विवाद रूप से भारत के सबसे महान राजाओं में से एक हैं। सारी दुनिया उनको एक बहादुर, बुद्धिमान, शौर्यवीर और दयालु शासक के रूप मे याद करती है। उनकी युद्ध प्रणालियां आज भी आधुनिक युग में अपनाई जातीं हैं जिनको विकसित कर उन्होंने अकेले दम पर मुगल सल्तनत को चुनौती दी थी। गुरिल्ला आक्रमण आज पूरी दुनिया के सैन्य प्रशिक्षण का खास हिस्सा है। यह गुरिल्ला हमला तकनीक शिवाजी का ही आविष्कार माना जाता है। अपने जीवन को मातृ भूमिकी धरोहर मानकर संतुलित और शानदार ढंग से जीना एक कला है, यह भी शिवाजी के संपूर्ण जीवन से परिलक्षित होता है। हम सबके भीतर एक शिवाजी विद्यमान हैं और हम सबमें बहुमूल्य मानवीय संस्कार भी विराजमान हैं। अगर आज हर युवा अपने भीतर अनंत ऊर्जा का स्रोत जाग्रत करना चाहता है तो उसको शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व और करतृत्व का अनुसरण करना चाहिए।

पूनम पांडे

युवा लेखि‍का 

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