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रोजाना एक कविता : आज पढ़ें मालिनी गौतम की कविता कुछ तो था

उनके मध्य प्रेम न था
अब नहीं था तो नहीं था
लेकिन कुछ तो था
जिसने बाँधे रखा उन्हें जीवन भर।

उनके दुःख साझा न थे
लेकिन कुछ तो था साझा
जो द्रवित हो पिघलता रहा
बहता रहा
भिगोता रहा आत्मा को
अँधेरे -उदास दिनों में।

उनके सुख भी नहीं थे साझा
लेकिन कुछ तो था ही
जो अंतस में खिलता रहा
महकता-गमकता रहा
और वक्त-बेवक्त बिखर गया
जीवन घाम पर बदली बन ।

उनके मध्य नफ़रत भी न थी
लेकिन कुछ तो था
जो दरकता रहा
टूटता रहा
चुभता रहा किरचों-सा
अंदर ही अंदर, रह-रहकर ।

उनके मध्य कुछ नहीं था
लेकिन कुछ न होकर भी
इस “कुछ” का होना ही
सब कुछ बना रहा उनके जीवन में।

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