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रोजाना एक कविता : आज पढ़ें अनुराग अनंत की कविता न सुने जाने की बेचैनी

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कह न सकने में एक संतोष है
कि कह नहीं सके
भाषा हमेशा से अक्षम रही है
भाषा की अक्षमता के सिर एक अपराध और सही

भोगे हुए को पचा ले जाने के बाद कहने का मन बनता है
भोगते समय मौन ही सहारा है
उस पार जहां पीड़ा को स्वर मिलता है
वहां यदि कोई कान न हो सुनने के लिए
कोई कंधा न हो निढाल होने के लिए
वहां यदि न नदी को न जमीन
ना वायु न आकाश
न अग्नि और न छाँव
बस एक निर्वात हो
जिसका नाम भी न मालूम हो
तो एक बेचैनी चील की तरह फड़फड़ाती रहती है
हृदय के बंद बक्से में
यह न सुने जाने की बेचैनी है

बुखार उतर जाने के बाद भी
यदि तपती रहे देह
पागल हो जाने के बाद भी हाथ न छोड़े स्मृति
मस्तक से टकराता रहे अतीत
आंखों में चुभता रहे वर्तमान
भविष्य कुहरे में। बदलता रहे रह-रह कर
तो कोई कैसे बांध लें अपने जूतों के फीते
कैसे पहने नया गरम कोट
और कैसे निकल जाए विचार की तरह

डूबते को तिनका सहारा होता होता
तिनके का सहारा कौन ?
किसी ने नहीं पूछा यह प्रश्न
यहां तक कि डूबते ने भी नहीं जानना चाहा
कितना बेसहारा है तिनका
तिनका बेचैन है
और यह बेचैनी
न सुने जाने की बेचैनी है

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