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सरगोशियां: सिग्नल वाली लड़की

sargosiyan

(यह कहानी समाचार पत्रों, चैनलों और रोजमर्रा की घटनाओं से प्रेरित है जिसका नाट्य रूपांतरण किया गया है। इसका सिर्फ और सिर्फ “जिन्दा व्यक्तियों” से ही सम्बन्ध है। उम्मीद है आप “जिन्दा व्यक्ति” और “जीवित व्यक्ति” के बीच का अंतर समझते होंगे। भाषा अश्लील हो सकती है लेकिन कोशिश कीजियेगा भाव समझने की )

ब्लैक उलझे बाल, इंटेंस सोगवार आँखें और सूखे सुर्ख अधर। खूबसूरती का ये सबसे “खतरनाक कॉकटेल” होता है। और इस “खतरनाक कॉकटेल” से मैं अक्सर रूबरू होता साकीनाका सिग्नल पर। इत्तेफाकन और कभी कभी इरादतन। ट्रैफिक हवलदार मुझे तुम्हारा “वो” समझता। सिग्नल के पास एक आढ़े-तिरछे पत्थर पर बैठी हुई होती तुम जैसे नन्हीं डूब पर बैठी ओंस की कोई एक बूंद। तुम्हारा बेनूर चेहरा इस बात की ताकीद करता कि तुम्हें सिग्नल की हरी लाइट से बेइंतहा नफ़रत थी।

और जब यही लाइट लाल में तब्दील होती तो तुम्हारे हुस्न की रंगत में एक अजीब सी लालिमा आ जाती जिसे देख डूबते सूरज को भी रश्क हो जाता। तुम हाथों में कुछ सामान लिए निकल जाती वाहनों के कारवां के बीच। कभी इतराती, कभी बलखाती, कभी मुस्कुराती तो कभी मायूस हो जाती। उफ्फ ! कातिल अदाओं की ऐ कमज़र्फ़ वैरायटी। शायद तुमसे किसी ने कहा होगा कि तुम “यूं” करो तो “यूं” होगा। जिस किसी ने भी कहा हो, वह बंदा था बेहद इंटेलीजेंट। उसे बखूबी पता था कि शराफत के कपड़े अब कोठियों पर नहीं सिग्नलों पर उतरते हैं।

खैर, जब से पवई शिफ्ट हुआ हूं, इधर आना जाना थोडा कम हो गया था। तकरीबन तीन महीने बाद इधर से गुजरा। तुम दिखी नहीं। ट्रैफिक हवलदार से पूछा तो उसका जवाब अन्दर सुन्न कर गया “यह जंगली जानवरों का शहर है साहब। यहाँ कीड़े-मकोड़ों को या तो मार दिया जाता है या मार लिया (रेप ) जाता है। दो महीने पहले कुछ लोगों ने उसका रेप कर सर को कुचल दिया ताकि पहचान न हो सके ………..” वो बोलता गया। वाहनों का वाइलन्ट साउन्ड हवा में सरगोशियाँ कर रहा था। मगर मेरे अन्दर कुछ टूट रहा था। दर्द का लिहाफ ओढे स्याह एहसास के लबों पर एक अजीब सी खामोशी थी। एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था …..एक सर्द सन्नाटा …जरुर तुमने उनके “यूं ” का विरोध किया होगा।

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