spot_img

रोजाना एक कविता : आज पढ़ें प्रवीण फ़क़ीर की गज़ल सरहद

poem

हम समझते थे कि बच्चा ये खिलाड़ी हो गया।
खेल ऐसा खेल बैठा …….के जुआरी हो गया।।

सोचने की बात है ये क्यों हुआ……कैसे हुआ,
इक नमाजी आदमी था …जो शराबी हो गया।

अब दिखाता है सियासत के.. तमाशे ख़ूब वो,
कल जमूरा था जो अब पक्का मदारी हो गया।

क्या कमाया क्या गया सोचा नहीं उसने कभी,
देखता हूँ आज वो ……बन्दा हिसाबी हो गया।

जब किया इज़हार उल्फत का सनम के रूबरू,
रंग रुख्सारों का फीका था …..गुलाबी हो गया।

बाँट कर हम सरहदें …बैठे इधर और वो उधर,
हम यहाँ दिल्ली हुए ..और वो करांची हो गया।

प्रवीण फ़क़ीर

New Delhi : फिर महंगा हुआ कमर्शियल गैस सिलेंडर, घरेलू सिलेंडर के भाव में बदलाव नहीं

नई दिल्ली : (New Delhi) देश की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने एलपीजी सिलेंडर की कीमत (prices of LPG cylinders) में एक बार फिर बढ़ोतरी...

Explore our articles