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सरगोशियाँ : मर्दानगी

सीन-1
(गोदान एक्सप्रेस, S-7, इलाहाबाद से पांच किलोमीटर दूर)

“अबे चाँद सी लगती है” एक ने कहा।
“नाम भी चाँद होगा ” दूसरा बोला।
“बक सारे, जरुरी नाहीं हौव ” तीसरे ने कहा।
“बकलोल हो तुम लोग। पूछ नाहीं सकत हो” चौथा ने बुद्धिमता का परिचय दिया।
“नाम का है तुम्हरा” पहले ने पूछा।
“नाम का है तुम्हरा” जवाब ना मिलने पर चौथे ने तेज आवाज़ में पूछा।
“जी पिंकी” लड़की ने लरजते होंठों से जवाब दिया।
“पिंकी …….मुंबई न दिल्लीवालों की, पिंकी है पैसों वालों की ”
सभी तेज आवाज़ में गाने लगे। लड़की के बाप से सहन नहीं हुआ। सो भिड़ गया उनसे। लड़कों ने जमकर धुनाई कर दी। ट्रेन इलाहबाद पहुँच गयी। लड़के उतर गए। बाप के सर से खून टपक रहा था। सारे पैसेंजर इरादतन खिड़की के बाहर झांक रहे थे।
शायद सबकी मर्दानगी सो रही थी ।

सीन-2
(वही ट्रेन, वही कोच, वही लोग ….ट्रेन इगतपुरी पहुँच गयी )
चोर चोर ……
एक यात्री एक बच्चे की तरफ इशारा कर चिल्ला रहा था। लोगों ने पकड़ लिया।
“साले चोरी करता है ……”
ये कहकर सभी उसे पीटने लगे। चारों तरफ से लात-मुक्के चल रहे थे।
शायद सबकी मर्दानगी जाग चुकी थी।

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