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प्रसिद्ध हिंदी फिल्म अभिनेता बलराज साहनी के नाम यह पत्र उनकी पत्नी संतोष ने उनके अवसान के बाद लिखा था।

याद है ना!

प्रिय बलराज,
आज सुबह घर का कुछ काम-काज करके, संगीत का रियाज करके आ गई हूं अपने कमरे में। बैठी हूं चारपाई पर गावतकिए का सहारा लिए। बारिश अभी-अभी रुकी है। कमरे की खुली खिड़की से शीतल हवा के झोके आ रहे हैं। खिड़की के बाहर है अपने बगीचे का वहीं अपना गुलमोहर, जिस पर चौमासे की घमासान बरसात की बौछारों के बावजूद दो केसरी फूल, मानों अपने जिए रहने, खिलते रहने की चाह से और शायद मेरा प्यासा मन रिझाने और बहलाने के लिए मुझे सतत प्रेरणा देने के लिए अब भी हरी कोमल पत्तियों के बीच से झांक-छिप मुझसे आंख मिचौली खेल रहे हैं। जियो केसरी फूल, जियो। चौमासे में आए तूफानों और आंधियों में जहां बड़े-बड़े पेड़ अपनी गहरी जड़ें जमीन से जोड़े न रख सके, धराशायी हुए, वहां तुम अपने आपको कायम रख सके। तुम्हें, तुम्हारे जीवन प्रेम को, तुम्हारी जीवन शक्ति को बधाई। पर क्या अगली बार तुम टिक सकोगे? नहीं प्रकृति के एक अटल नियम को तुम तोड़ सकोगे झरझर कर, सूखकर, मिट्टी से मिलकर अगली बहार में तुम ही तो फिर फूटने को बेताब केसरी कलियां बनोगे?

और बगीचे की दीवार के बाहर सड़क के चौराहे पर खड़े हैं, तुम्हारे मेरे पुराने बुजुर्ग, दोस्त दो पठानी कद के, रुनझुन नाचती हरी पत्तियों की पोशाक पहने, सर्व सुंदर पेड़ का खिताब पा चुके, जनाब दो इमली वृक्ष। जिन्हें हम दोनों ने अपने मित्रों की सहायता से व्यापारियों की बेरहम कुल्हाड़ियों का शिकार होने से बचा ही तो लिया था। याद है न! कितने बरस हो गए हैं इस घटना को बीते, जो मन में अभी भी ताजी है, प्यार की चोट की तरह…. बैठे-बैठे, राह ताकते हुए मिर्जा गालिब की कही दो लाइनें होंठों पर यूं ही उभर आई हैं –

‘इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के।’

हां, ये पंक्तियां मेरी फितरत, मेरे अनुभव के बहुत करीब हैं… इश्क ही ने तो लैला-मजनू, सस्सी-पुन्नू, हीर रांझा, शीरी-फरहाद जैसे प्रेमियों को अमर किया। प्रेम ही ने मीरा, नानक, तुलसीदास, सूरदास, कबीर जैसे संतों, भक्त कवियों और उनके काव्य को अमर किया। देशप्रेम ने ही भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव जैसे अनेक वीरों को आत्मबलिदान करने की ललकार दी। देश में एकता, अहिंसा, विश्व शक्ति परस्पर सद्भावना के प्रेम ने अपने जीवन की बलि देने तक की दृढ़शक्ति दी…. प्रेम में प्रेरणा, साहस, सहनशीलता, उदारता, क्षमा सभी तो हैं। सच्चा प्रेम अधिकार देता है, अधिकार छीनता तो नहीं…

‘ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होय’ अगर मेरे समेत सारी दुनिया के लोग इस कथन पर चल सकते तो ये दुनिया स्वर्ग न बनने लगती? सच्चाई तो यह है कि न मैं और न दुनिया के अधिकतम लोग इस अनमोल कथनी को अमल में ला रहे हैं….

‘प्रेम गली अति सांकरी’ भी तो किसी ने कहा था, शायद कबीर ने प्रेम का इकरार करना और उस इकरार को निभा सकना किसी विरले के ही बस की बात है। क्या यह मेरे बस की बात हुई है? बाप रे! मैं भी बैठी-बैठी किधर किधर बहक गई हूं?

तुम्हारी
तोष

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