
अच्छी और कालजयी साहित्य की रचना एक कठिन कार्य है, पर इससे भी कठिन है, प्रेरणादायक कविता का सृजन। इसके लिए स्वयं किसी गुरु जैसा मन और मस्तिष्क बनाना होता है। काव्य शिरोमणि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ऐसे ही एक साहित्यकार थे, जिनके लिखे गीत हमें हमेशा प्रेरणा देते हैं। उनकी हर रचना बाल मन के साथ बड़ी उम्र वर्ग के लोगों को भी प्रेरित करने वाली होती है। द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की कविता ‘मन के हारे हार सदा रे, मन के जीते जीत’ को यदि कोई जीवन का मंत्र बना ले , तॊ उसकी सफलता को कोई रोक नहीं सकता। आज प्रस्तुत है इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट की ‘रोजाना एक कविता’ श्रृंखला में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की वह कविता।
मन के हारे हार सदा रे, मन के जीते जीत
मत निराश हो यों, तू उठ, ओ मेरे मन के मीत।
माना पथिक अकेला तू, पथ भी तेरा अनजान
और जिन्दगी भर चलना इस तरह नहीं आसान।
पर चलने वालों को इसकी नहीं तनिक परवाह
बन जाती है साथी उनकी स्वयं अपरिचित राह।
दिशा दिशा बनती अनुकूल, भले कितनी विपरीत
मन के हारे हार सदा रे, मन के जीते जीत।
तोड़ पर्वतों को, चट्टानों को सरिता की धार
बहती मैदानों में, करती धरती का शृंगार।
रुकती पल भर भी न, विफल बाँधों के हुए प्रयास
क्योंकि स्वयं पथ निर्मित करने का उसमें विश्वास।
लहर लहर से उठता हर क्षण जीवन का संगीत
मन के हारे हार सदा रे, मन के जीते जीत।
समझा जिनको शूल वही हैं तेरे पथ के फूल
और फूल जिनको समझा तूवे ही पथ के शूल।
क्योंकि शूल पर पड़ते ही पग बढ़ता स्वयं तुरंत
किंतु फूल को देख पथिक का रुक जाता है पंथ।
इसी भाँति उलटी-सी है कुछ इस दुनिया की रीति
मन के हारे हार सदा रे, मन के जीते जीत।


