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रोजाना एक कविता : ठाकुर प्रसाद सिंह की वह कविता जिसने नवगीत को दिया एक नया आयाम

आज हिन्दी नवगीत के प्रवर्तक ठाकुर प्रसाद सिंह का जन्मदिन है। ठाकुर प्रसाद सिंह का एक गीत-संग्रह 1959 में छपा था, काफी मशहूर हुआ था। आज इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट की ‘रोजाना एक कविता’ श्रृंखला में आप पाठकों के बीच बेहद पेश है उसी संग्रह का सबसे लोकप्रिय हुआ एक नवगीत।

कब से तुम गा रहे, कब से तुम गा रहे
कब से तुम गा रहे!

जाल धर आए हो नाव में
मछुओं के गाँव में
मेरी गली साँकरी की छाँव में
वंशी बजा रहे, कि
कब से तुम गा रहे
कब से हम गा रहे, कब से हम गा रहे
कब से हम गा रहे!

घनी-घनी पाँत है खिजूर की
राह में हुजूर की
तानें खींच लाईं मुझे दूर की
वंशी नहीं दिल ही गला कर
तेरी गली में हम बहा रहे
कब से हम गा रहे!

सूनी तलैया की ओट में
डुबो दिया चोट ने
तीर लगे घायल कुरंग-सा
मन लगा लोटने
जामुन-सी काली इन भौंह की छाँह में
डूबे हम जा रहे,
कब से हम गा रहे!

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