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Ratlam : बंगाली समाज की शारदीय दुर्गा पूजा का विशेष क्रम है अष्टमी की संधि पूजा

रतलाम : बंगाली समाज की दुर्गा पूजा में अष्टमी की संधि पूजा का विशेष महत्व होता है। और इस दिन समाज के सदस्य बड़े मनोयोग से माँ दुर्गा की पूजा, आरती, पुष्पांजलि और भोग प्रसादी के साथ साथ संधि पूजा का क्रम सम्पन्न करते हैं। अष्टमी और नवमी तिथि के संधि बेला में आयोजित होने वाली संधि पूजा में महिषासुर मर्दिनी माँ दुर्गा को 108 दीपक, जवाकुसुम पुष्प और कमल पुष्प अर्पित कर विशेष पूजा अर्चना की जाती है। पाँच दिवसीय पूजा के क्रम में संधि पूजा और सिंदूर खेला को देखने का सभी मे विशेष उत्साह रहता है।

इस बार रविवार को सार्वजनिक दुर्गा पूजा की स्वर्ण जयंती मना रहे बंगाली समाज के सदस्यगण पूरे उत्साह के साथ प्रात:कालीन पूजा में सम्मिलित हुए। फल फूल मिष्ठान आदि के साथ माँ दुर्गा का पूजन अर्चन किया गया। सांध्यकालीन अष्टमी की संधि पूजा में 108 दीपक, 108 जवाकुसुम पुष्प और 108 कमल पुष्प के साथ पूजा की गई। समाज के युवाओं ने बंगाल के प्रसिद्ध धुनुची नृत्य के साथ माँ दुर्गा की आराधना की।

नवरात्रि पर्व में तिथि परिवर्तन की संधि बेला में की जाने वाली इस विशेष संधि पूजा में कई सामाजिक संदेश भी निहित है। माँ दुर्गा ने अपनी शक्ति से आसुरी प्रवृत्ति वाले महिषासुर का नाश किया था। उसी शक्ति की विशेष उपासना इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण विजय के उद्देश्य से की थी। माँ दुर्गा द्वारा अपनी योगमाया से एक पुष्प कम कर देने पर उसकी पूर्ति हेतु भगवान श्रीराम अपने कमल रूपी नयन देने को तत्पर हुए तो शक्तिस्वरूपा माँ ने प्रसन्न होकर रावण विजय का आशीर्वाद दिया था। उसी तरह व्यक्ति अपने अंदर और बाहर समाज में व्याप्त आसुरी शक्ति रूपी बुराइयों के उन्मूलन एवं अच्छाई की विजय की कामना के उद्देश्य हेतु यह पूजा करता है।

बंगाली समाज की सार्वजनिक दुर्गा पूजा के स्वर्ण जयंती वर्ष पर समाजजनों में विशेष उत्साह है। आयोजक मंडल ने इस 50 वर्षों के लंबे समय तक दुर्गा पूजा को निर्बाध चलाने में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष योगदान देने वाले सभी समाजजनों को स्मरण किया एवं धन्यवाद ज्ञापित किया। वर्ष 1974 की प्रथम पूजा के साक्षी समाजजन आज गिनती के ही बचे है। ऐसे नींव के पत्थरों को स्मरण कर आज के युवा उनकी पूजा परम्परा का सकुशल निर्वहन कर रहे है। यथासंभव बंगाल के गौरव शारदीय दुर्गा पूजा को यथारूप रतलाम में मनाने का प्रयास किया जाता रहा है। इस अवसर पर बंगाली समाज रतलाम के कई युवा जो अपने कार्य की वजह से बाहर है वे रतलाम आकर प्रत्यक्ष और जो नहीं आ पाते है वो सोशल मीडिया के माध्यम से इस पूजा से जुड़ते हैं।

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