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New Delhi : लंदन बैडमिंटन इवेंट से जजों को जोड़ने वाली फर्ज़ी पोस्ट मामले में आदेश सुरक्षित

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New Delhi: Order Reserved in Case Regarding Fake Posts Linking Judges to London Badminton Event

नई दिल्ली : (New Delhi) पिछले दिनों लंदन में दर्जनों जजों के बैडमिंटन टूर्नामेंट में हिस्सा लेने की कथित रुप से मनगढ़ंत खबरों को हटाने की मांग वाली याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस तेजस करिया (Justice Tejas Karia) की पीठ ने फैसला सुरक्षित रखने का आदेश दिया।

सुनवाई के दौरान बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (बीएआई) के वकील अपूर्व कुरुप (Apoorv Kurup) ने कहा कि इस संबंध में मनगढ़ंत और झूठी खबरें फैलाई जा रही है। उन्होंने इन खबरों को फर्जी बताते हुए इन्हें हटाने की मांग की। उन्होंने कहा कि दर्जनों जजों के लंदन में बैडमिंटन खेलने की खबरें वायरल हो गई हैं। इन खबरों से ये खेल बदनाम हो रहा है।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Tushar Mehta) ने कहा कि केंद्र सरकार ने फैक्ट चेक किया है। ये खबरें झूठी और दुर्भावना पर आधारित हैं। मेहता ने कहा कि जो फोटो दिखाया जा रहा है उसमें चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रमनाथ और केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और किरेन रिजिजू (Chief Justice Surya Kant, Justice Vikram Nath, and Union Ministers Arjun Ram Meghwal and Kiren Rijiju) बैडमिंटन खेलते दिखाई दे रहे हैं। ये सभी नवंबर, 2025 की दिल्ली की हैं, जब राष्ट्रीय स्तर का बैडमिंटन टूर्नामेंट आयोजित किया गया था।

तुषार मेहता ने कहा कि चीफ जस्टिस ने लंदन जाकर किसी बैडमिंटन या किसी खेल आयोजन में हिस्सा नहीं लिया। चीफ जस्टिस लंदन गए थे जहां वे इंग्लैंड के चीफ जस्टिस से मिले और वहां के उच्चतम न्यायालय के एक कार्यक्रम में शामिल हुए। केंद्रीय मंत्रियों ने भी आर्बिट्रेशन के मसले पर कुछ वकीलों को संबोधित किया। तब कोर्ट ने कहा कि आखिरकार इस पर तो सरकार को ही आईटी एक्ट (IT Act) के तहत कार्रवाई करनी है। तब याचिकाकर्ता ने कहा कि कोर्ट को इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी करना चाहिए।

वायरल सोशल मीडिया पोस्ट में कहा गया है कि चीफ जस्टिस सूर्यकांत और कुछ केंद्रीय मंत्रियों के साथ देश के करीब 75 जज ने लंदन जाकर बैडमिंटन टूर्नामेंट में हिस्सा लिया। वायरल सोशल मीडिया पोस्ट में कहा गया है कि ये सारा आयोजन देश के करदाताओं के पैसे से किया गया। इस वायरल पोस्ट से देश की न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे। लोग बैडमिंटन टूर्नामेंट में हिस्सा लेने वाले जजों की ईमानदारी पर भी सवाल उठाने लगे।