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Mumbai : अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस के अवसर पर, सामाजिक न्याय के लिए एक आवाज

मुंबई : अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस एक सार्वभौमिक जागरूकता दिवस है, जो हर साल 23 जून को मनाया जाता है। इस दिन की घोषणा 2010 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा की गई थी और 23 जून 2011 को अनुमोदित और स्थापित की गई थी। अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस की स्थापना लुंबा फाउंडेशन के नेतृत्व में विभिन्न संगठनों के प्रयासों से की गई थी। लुंबा फाउंडेशन एक अंतरराष्ट्रीय चैरिटी है जो विधवाओं के अधिकारों की वकालत करता है। राज लुंबा की मां 23 जून, 1954 को विधवा हुई थीं। इस दिन का अंतिम फोकस विधवाओं के मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाना, विधवाओं को सशक्त बनाना, उन्हें हिंसा से मुक्त जीवन प्रदान करना, विधवाओं के अधिकारों और कल्याण की वकालत करना, जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं और मानवाधिकारों की वकालत करना है। उनके सम्मान आदि के लिए संघर्ष करना।

अमयरुद्र बहुउद्देश्यीय धर्मार्थ संस्था की शीतल जीवन सिंह राजपूत ने बताया कि भारत में 4 करोड़ से अधिक विधवा महिलाएं हैं। जिसमें लगभग 12 लाख विधवा महिलाएं झारखंड क्षेत्र की हैं। हमारे देश में सभी महिलाओं को अपेक्षित सहयोगियों और बराबरी की जरूरत होती है। आज विधवाओं को सम्मान नहीं मिलता। 21वीं सदी में भी अधिकांश विधवाएं अपने अधिकारों से वंचित हैं, लेकिन कोई यह नहीं भूल सकता कि विधवाएं भी हमारे समाज और देश का हिस्सा हैं। देश के विकास में उनके कार्यों का बहुत बड़ा योगदान है। इसके लिए सभी को उनका सम्मान करना चाहिए। अपने साथी के जाने का बड़ा दुख आपको अंदर तक दुखी कर देता है। पति के जाने के बाद महिलाएं खुद को काफी हद तक अकेली और बेसहारा पाती हैं। राज लुंबा के अनुसार संगठन का अनुभव यह है कि पति की मौत के बाद महिलाओं को काफी कष्ट सहना पड़ता है, परिवार के साथ-साथ समाज भी उनसे घृणा करता है। विधवाओं को संपत्ति के उत्तराधिकार से वंचित कर दिया जाता परिणामस्वरूप विधवाओं को अपनी आर्थिक स्थिति खराब होने के बावजूद अपने पति का घर, संपत्ति और जमीन बेचनी पड़ती है।

इसलिए विधवाओं के लिए अपने बच्चों का पालन-पोषण करना बहुत मुश्किल था। हालांकि, विधवा सभी समस्याओं का सामना करते हुए अपना काम करती है। इसलिए उन महिलाओं को विधवा के नाम से अपमानित करने के बजाय पूर्णांगिनी नाम से सम्मानित किया जाना चाहिए।

संस्था के उपाध्यक्ष नितिन सिंह राजपूत ने कहा कि इस प्रकार उपरोक्त सभी मामलों को रोकने के लिए 23 जून विधवा दिवस से संकल्प सभा का आयोजन किया गया है। इस संकल्प सभा के सम्मानित अतिथि तन, मन और धन से सहयोग करें यह की अपेक्षा है।
अमयरुद्र बहुउद्देश्यीय धर्मार्थ संस्था के अंतर्गत तिसगांव जिला मुख्यालय पर दिनांक 27 जून को छत्रपति संभाजीनगर में 23 जून को अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस के रूप में मनाया गया। अमयरुद्र बहुउद्देश्यीय धर्मार्थ संस्था द्वारा विधवाओं का पूर्णांगिनी नामकरण कार्यक्रम किया गया तथा सभी विधवाओं एवं तलाकशुदा महिलाओं को बालगृह, संजय गांधी निराधार योजना, सुकन्या योजना, बालकामगार शिष्यावर्ती आदि अनेक योजनाओं की जानकारी दी गई। इस अवसर पर तिसगांव की सरपंच शकुंतला लालचंद कसुरे, ग्राम पंचायत सदस्य संजय जाधव, रोजगार सेवक शांता मोकले, सेविका मीरा तीथे, संगीता मुगदाल, कल्याणी दिवारे, शारदा जाधव एवं तिसगांव की सभी विधवा एवं तलाकशुदा महिलाएं उपस्थित थीं। महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम जिसमें मास्टर ट्रेनर अमयरुद्र बहुउद्देश्यीय चैरिटेबल संस्था, बौद्धिक खेल सचिव मछिन्द्र जाधव, साथ ही निराश्रित महिलाओं के लिए सतत प्रयास की अध्यक्ष शीतल राजपूत ने स्वयं उपस्थित होकर विधवा महिलाओं के बच्चों को पाठ्य सामग्री वितरित की। इस कार्यक्रम में ज्ञानेश्वर तुरकरे साहब आदि उपस्थित रहे जिन्होंने सभी योजना प्रपत्रों की जानकारी दी तथा कार्यक्रम का संचालन इस प्रकार किया गया।

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