
बच्चों का स्कूल । इतिहास की कक्षा चल रही थी। अध्यापक बच्चों को इतिहास का कोई पाठ लिखा रहे थे। पढ़ाते-पढ़ाते अध्यापक की फर्श पर नजर पड़ी, वहां मुंगफली के छिलके बिखरे पड़े थे। फिर क्या था, उन्होंने न किसी से पूछा, न जानकारी ही लेनी चाही कि किसने ऐसा किया है; छड़ी उठा ली और लगे एक सिरे से सभी छात्रों को धुनने।
पीटते-पीटते जब वे एक विदयार्थी के पास पहुंचे तो उसने उन्हें रोकते हुए कहा, “मुझे मत मारिए, जब मैंने गलती नहीं की है तो मैं सजा क्यों भुगबूं!” उक्त छात्र को बात में दम था। किसी एक छात्र की गलती की सजा पूरी कक्षा के विद्यार्थी क्यों भुगतें ? गुरुजी ने उसे मारा नहीं और आगे बढ़ गये।
यह घटना लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विद्यार्थी जीवन की है। वह बचपन से ही निर्भीक थे। आगे चलकर उन्होंने ही सबसे पहले देश को यह नारा दिया था’ “स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है ।” और इसी उद्घोष के साथ वे राष्ट्रीय जनजीवन में कूद पड़े थे।


