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motivational story : दो महापुरुष

जून 1940, स्थान सेवाग्राम। गांधीजी ने सुभाष से कहा, “तुम्हारा आग्रह हैं कि जन-आन्दोलन छेड़ दिया जाए। तुम संघर्ष में ही निखरते हो। तुम्हारा देशप्रेम और भारत को स्वतंत्र कराने का संकल्प अद्वितीय है। तुम्हारी निष्ठा पारदर्शी है।

आत्मबलिदान और कष्टसहन की भावना में तुम बेजोड़ हो। लेकिन मैं चाहता हूं कि इन गुणों का उपयोग अधिक सही समय पर किया जाए। यह सुनकर सुभाष का कहना था, “इंग्लैंड इस युद्ध में जीते या हारे, इतना निश्चित है वह कमजोर हो जाएगा। उसमें इतनी शक्ति नहीं रहेगी कि वह भारत के प्रशासन की जिम्मेदारी ढो सके। फिर हमारे थोड़े से प्रयास से ही वह भारत की स्वतंत्रता को मान्यता प्रदान कर देगा। “

इतना कहकर, अधीर होकर सुभाष गांधीजी से बोले, “बापू अगर आप ललकारें तो समूचा राष्ट्र आपके पौछे खड़ा हो जाएगा।” मगर बापू अपनी बात पर डटे रहे, “भले ही समूचा राष्ट्र तैयार हो, फिर भी मुझे वह काम नहीं करना चाहिए, जिसके लिए यह घड़ी उपयुक्त नहीं है।”

सुभाष अधीर हो रहे थे। उन्होंने याचना के स्वर में कहा, “आजादी का आंदोलन छेड़ने के लिए आशीर्वाद दीजिए।”

“सुभाष, तुम्हें मेरे आशीर्वाद की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम्हारा अंतःकरण यह कहता है कि शत्रु पर आक्रमण के लिए यही समय उपयुक्त है तो आगे बढ़ो और भरपूर चेष्टा करो। तुम सफल रहे तो मैं तुम्हारा अभिनंदन सबसे पहले करूंगा।” इस प्रकार सुभाष बापू से हताश होकर 16 जनवरी 1941 को रात को भारत छोड़कर विश्व की अन्य शक्तियों से मदद की तलाश में निकल पड़े और फिर कभी स्वदेश नहीं लौटे।

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