
यह घटना उस समय की है, जब गांधीजी साबरमती आश्रम में रह रहे थे। एक यह दिन एक नवयुवक उनके पास आकर बोला, ‘बापू, मैं भी देश सेवा करना चाहता हूं। आप मुझे मेरे योग्य कोई सेवा बताइए। मैं अंग्रेजी का भी अच्छा ज्ञाता हूँ। मैंने उच्च स्तर तक पढ़ाई की है और मेरे रहन-सहन का स्तर भी ऊंचा है।’
युवक को लगा कि उसके ऐसा बताने से गांधीजी उससे प्रभावित होंगे और उसे उच्च स्तर का कार्य सौंपेंगे। गांधीजी बोले, ‘फिलहाल तो आश्रमवासियों के भोजन के लिए कुछ गेहूं बीनने हैं, क्या आप इसमें मदद करेंगे?’
यह सुनकर युवक ने बेमन से गेहूं बीनने शुरू कर दिए। उसे गेहूं बीनते हुए काफी देर हो गई, तो थकावट से चूर युवक बोला, ‘बापू, अब आज्ञा दीजिए। दरअसल, मैं शाम का खाना जल्दी ही खा लेता हूं।’
उसकी इस बात पर गांधीजी बोले, ‘कोई बात नहीं, आज आप यहीं पर खाइए। आश्रम का भोजन भी बस तैयार होनेवाला ही है।’ युवक ने आश्रम का सादा भोजन बड़ी मुश्किल से अपने गले से नीचे उतारा और अपने बरतनों को भी स्वयं ही साफ किया। जब वह जाने लगा तो गांधीजी युवक के कंधे पर हाथ रखकर बोले, ‘नौजवान, तुम्हारे अंदर देश सेवा की भावना होना अच्छी बात है, किंतु देश सेवा के लिए मन निर्मल, स्वच्छ होना चाहिए और मन में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने के बजाय, सबको एक समान समझने की भावना होनी चाहिए। जो व्यक्ति किसी में फर्क नहीं समझता, वही सब धर्मों, सब स्तरों से ऊपर उठकर सेवा कर सकता है। मेरे खयाल से तुम समझ गए होगे कि मैं तुम्हें क्या कहना चाह रहा हूं?’
युवक गांधीजी का अभिप्राय समझकर शर्मिंदा हो गया और उसने गांधीजी से माफी माँगकर कहा, ‘बापूजी, आज के बाद मैं कभी स्वयं को सर्वश्रेष्ठ व उच्च स्तर का नहीं समझूंगा। सच्चे मन से देश की व व्यक्ति की सेवा करूंगा।’ युवक की बात सुनकर गांधीजी ने उसे गले से लगा लिया।


