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रोजाना एक कविता : आज पढ़िए जॉन कीट्स को जिसकी कविताओं से झांकती है ज़िंदगी

जॉन कीट्स… वो कवि जिसकी कविताओं को अंग्रेज़ी साहित्य-जगत नापसंद करता था, लेकिन आम लोग सबसे ज्यादा पसंद करते थे। वो कवि जिसने महज़ 5 साल ही लिखा, लेकिन दुनिया के महानतम कवियों में से एक बन बैठा। वो कवि जिसके जीते-जी उसकी किताबों की सिर्फ 200 प्रतियां बिकी थीं, आज लाखों बिकती हैं। आज इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट की ‘रोजाना एक कविता’ श्रृंखला में आप पाठकों के बीच पेश है जॉन कीट्स की चुनिंदा कविताएं जिसका हिंदी में अनुवाद किया है अनिल जनविजय ने। आज जॉन कीट्स को पढ़ना इसीलिए भी जरुरी है क्योंकि आज उनका जन्मोत्सव है। पढ़िएगा।

वो अनुपमा, जिसमें ज़रा भी दया नहीं थी

शस्त्रों-अस्त्रों के सूरमा हो तुम , कौन होगा तुमसे पहले
क्यों घूम रहे तुम पीले, उदास से , भटक रहे हो अकेले ?
वह नरकट भी सूख गया है जो झील किनारे झूम रहा था ।
वह पक्षी गाना भूल गया है जो वहाँ आज़ाद घूम रहा था ।

क्या घटा ऐसा साथ तुम्हारे ओ अस्त्रों – शस्त्रों के सूरमा !
थके-मान्दे और परेशान से, खिन्न, हताश, दुखी, विषमा ?
खोल पेड़ में गिलहरी का , दाने -खाने से भरा हुआ पूरा ।
फ़सल कट चुकी , खलिहान भरे हैं, बँट गया सबका कूरा ।


मौत के बारे में

क्या मौत की नींद सो सकते हैं, जब जीवन हो एक सपना,
और सुख लगता हो किसी प्रेत सा, या उसे कहें मृगतृष्णा ?
जब दृश्य ख़ुशी के दिखें कोई तो लगें वो क्षणिक आनन्द,
पीड़ा पैदा करता है मन में यह विचार कि एक दिन मरना।


कितनी अजीब बात है कि पृथ्वी पर आदमी ख़ूब घूमता है,
दुखी रहता है, शोकग्रस्त वो, मन उसका नहीं झूमता है ।
यह ऊबड़-खाबड़ राह जीवन की; अकेले वह झेल न पाए
भावी जीवन का सर्वनाश ही उसमें जीने की ललक जगाए ।

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