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रोटी के चार हर्फ़

वह लारियों से बोरियां उतार रहा था। बहुत ही मरियल किस्म का था। बाल उलझे थे। दाढी महीने भर की उगी हुई थी। आँखों में याचक का भाव था और जिस्म पर कुछ फटे-पुराने कपड़े। बोरियां उतारते-उतारते वह हांफने लगा था। थकान मिटाने के लिए मेरे पास बैठ गया। हाय हैल्लो हुआ। एक मामूली गुफ्तगू के बाद बात थोड़ी लम्बी हो गई। सियासी भेड़ियों की शराफत का जिक्र हुआ। फिरकापरस्तों की नफासत पर तंज हुआ और वामपंथियों के दोहरेपन पर रोना आया। बातों बातों में पता चला कि उसने हिंदी साहित्य में मास्टर किया है।

एक उम्दा अफसानानिगार था वो लेकिन जाने क्यूँ उसने अफ़सानानिगारी के फ़न को दफ़न कर लिया था अपने सीने में। सवाल पूछा तो दर्द खुद-ब-खुद लबों पर पसर गया। “भाई साहब, मैं भी चाहता हूं कि अपने ख्यालों में उतार लूं अपने महबूब को और चंद मरमरी लफ़्ज़ों से तराश दूँ उसका जिस्म लेकिन सारा जोश काफूर हो जाता है जब ख्याल आता है घर के कोने में दुबके उन औरतों का जो हाथ भर की कतरन से अपना जिस्म छुपाने की जद्दोजहद कर रही हैं।

अकड़ जाती है कलम की निब जब कागज पर उतारता हूं उस माँ का अक्स जिसकी आँखें पीप से भर गयी हैं। फटने लगती हैं ज़ेहन की सारी नसें जब ख्याल आता है बाबूजी का जिनके जिस्म पर भूख ने इतने खंज़र मारे हैं कि सिर्फ हड्डियों का ढांचा दीखता है। मीठे अल्फाजों से दिल बहलाया जा सकता है, भूखे पेट नहीं।”

“अबे वो बिहारी, तुझी आई झवली, ज्यादा चर्बी है तेरे को….. चल काम कर साले कामचोर” सुपरवाइज़र चिल्ला उठा था। वह चला गया, ज़ेहन में एक शेर छोड़कर…
खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए…….
सवाल ये है, किताबों ने क्या दिया मुझको !

अमित बृज

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