
ढाका (बांग्लादेश) : (Dhaka) देश में बागेरहाट की ऐतिहासिक खान जहान (आर.) दरगाह के तालाब में रातभर एक सात साल की बच्ची की तलाश की गई। इस बच्ची को नहाते समय मगरमच्छ खींचकर ले गया है। यह घटना तालाब के महिला घाट पर सोमवार रात करीब 8:30 बजे हुई। इसके तुरंत बाद, दमकल विभाग (Fire Department) के कर्मियों और स्थानीय लोगों ने मिलकर बचाव अभियान शुरू किया। राजधानी ढाका से बागेरहाट की दूरी सड़क मार्ग से लगभग 225 किलोमीटर है। फिलहाल बच्ची का कोई अता-पता नहीं है।
बांग्ला अखबार ‘प्रोथोम अलो’ की रिपोर्ट के अनुसार, मजार के मुख्य खादिम फकीर तारिकुल इस्लाम ने बताया कि बच्ची का नाम फातिमा है। वह अपनी मां के साथ मजार पर ही रहती है। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि बच्ची तालाब में नहाने गई। तालाब में पला मगरमच्छ अचानक उसे खींचकर ले गया। बागेरहाट फायर सर्विस के स्टेशन (Bagerhat Fire Service) अधिकारी शेख मामुनुर राशिद ने बताया कि रात 10:30 बजे तक भी बच्ची नहीं मिल पाई और बचाव कार्य जारी है।
खादिम ने बताया कि पीड़ित बच्ची की मां विकलांग है। दोनों दरगाह के पास लंबे समय से रह रही हैं। बागेरहाट-2 के सांसद शेख मंजुरुल हक (रहाद), जिला उपायुक्त गुलाम मोहम्मद बातेन और पुलिस अधीक्षक हसन मोहम्मद नासर रिकाबदर ने घटनास्थल का दौरा किया। एक प्रत्यक्षदर्शी महिला ने बताया, “हम घाट के ऊपर थे। लड़की महिलाओं के घाट पर नीचे गई। तभी अचानक मगरमच्छ ने उसके पांव को अपने मुंह में भर लिया और पानी की गहराई की तरफ खींच ले गया। बच्ची की चीख सुनकर आसपास के लोग घाट की तरफ दौड़े। कुछ लोग बच्ची को बचाने के लिए नाव लेकर तालाब पर गए। लेकिन, कोई पता नहीं चला।”
फायर सर्विस और सिविल डिफेंस के बागेरहाट के स्टेशन ऑफिसर शेख मामुनूर राशिद ने पत्रकारों से कहा कि मगरमच्छ हिंसक होते हैं। इसलिए बचावकर्मियों का पानी में नीचे जाना जोखिम भरा हो सकता है। रात का समय है। फिर भी, हम अभी भी बच्ची को खोज कर रहे हैं। इससे पहले अप्रैल में इसी तालाब में मगरमच्छ के कुत्ते को घसीटने की घटना सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। उस समय इलाके के तालाब में मगरमच्छ रखने पर सवाल उठे थे। इस तालाब में मगरमच्छ पालने की लंबी परंपरा है। लेकिन इस तालाब में अभी जो मादा मगरमच्छ है, वह खानजहां के जमाने के मगरमच्छ की वंशज नहीं है।
कहा जाता है कि हजरत खानजहां अली (Hazrat Khan Jahan Ali) ने इस तालाब का निर्माण कराया था। इसके बाद उन्होंने मगरमच्छों का एक जोड़ा छोड़ा। बाद में, उन्होंने नर मगरमच्छ का नाम काला पहाड़ और मादा मगरमच्छ का नाम ढाला पहाड़ रखा। उसके बाद उनके वंशजों ने भी इस परंपरा का पालन किया। उनके आखिरी वंशज की मौत फरवरी 2015 में हो चुकी है। 2005 में, भारत से कुछ मगरमच्छ लाकर इस तालाब में छोड़े गए थे। उनमें से कुछ मर गए। आखिरी दो में से एक मगरमच्छ की मौत अक्टूबर 2023 में हो गई। तब से तालाब में सिर्फ एक मादा मगरमच्छ है।


