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रोजाना एक कविता: आज पढ़िए अरुणा राय को जिनकी कविताओं में झलकता है जिंदगी के मूक शब्द

हिन्दी की युवा कवियत्री अरुणा राय का आज जन्मोत्सव है। अपने मन के गहन कोने से उभरती आवाजों को शब्द देना उनकी अभिरुचियों में शामिल है। आइए उनके जन्मोत्सव पर आज इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट की ‘रोजाना एक कविता’ श्रृंखला में हम पढ़ते हैं उनकी चुनिंदा कविताएं।

दुनिया को
बोलती-बतियाती,
घूमती-फिरती,
हंसती-ठहहाती,
बूझती-समझती,
चलती-उडती,
सजती-सवरती,
गुनती-बुनती,
नकारती-फुफकारती
औरतें चुभती हैं!

मुझे पाने की हवस में
बेतरह चीख़ेगा वह
बाहुपाश में ले त्रस्‍त कर देगा
अंत में
गड़ा डालेगा अपने बनैले दाँत
मेरे हृदय प्रकोष्‍ठ में
चूस जाएगा सारा रक्‍त
वहाँ रहना तुम
मेरे साथ
हवा से
जब रक्‍तश्‍लथ, हताश
अपने दाँत निकालेगा वह
उसी राह
निकल आना तुम
मेरे साथ
अपने होने की सुगंध लिए
और समा जाना
गीतों में धुन बनकर…

स्वप्न में
मन के सादे कागज पर
एक रात किसी ने
ईशारों से लिख दिया अ….
और अकारण
शुरू हो गया वह
और एक अनमनापन बना रहने लगा
फिर उस अनमनेपन को दूर करने को
एक दिन आई खुशी
और आजू-बाजू कई कारण
खडें कर दिए
कारणों ने इस अनमनेपन को पांव दे दिए
और वह लगा डग भरने , चलने और
और अखीर में उड़ने
अब वह उड़ता चला जाता वहां कहीं भी
जिधर का ईशारा करता अ…
और पाता कि यह दुनिया तो
इसी अकारण प्यार से चल रही है
और उसे पहली बार प्यारी लगी यह
कि उसे पता ही नही था इसकी बाबत
जबकि तमाम उम्र वह
इसी के बारे में कलम घिसता रहा था

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