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रोजाना एक कविता : अरुण लाल की कविता ‘मैं खोल सकूं तुम्हारा मन…’

अरुण लाल

क्या तुम नहीं चाहती
कि मैं लिखूं कविता तुम्हारे लिए
झांकू तुम्हारे मन में
खोल कर रख दूं तुम्हारा मन तुम्हारे सामने

क्या तुम नहीं चाहती
कि मैं बताऊं कि कितनी शिद्दत 
से जानता हूं तुम्हें 
और सोचता हूं कभी
कि तुम समझती हो कि तुम्हारे होने
को जानना बहुत मुश्किल है
मेरे लिए ही नहीं किसी भी पुरुष के लिए
शायद हम अभी उस मोड़ पर नहीं पहुंचे
जहां तुम्हारे होने को स्वीकारा जा सके

मैं जानता हूं सारी प्रगतिशीलता के बावजूद
तुम्हें आज भी मुझसे जोड़ कर ही जाना जाता है
क्या तुम नहीं चाहती मैं कह दूं
वह सब जो शायद तुम नहीं कह सकती
तुम्हें रोक दिया जाता है
तुम्हें टोक दिया जाता है
हर बार किसी-किसी बहाने
कर दी जाती है हत्या तुम्हारे होने की

क्या तुम नही चाहती कि मैं
शर्मिंदा होऊं अपनी करनी पर
क्या तुम नहीं चाहती मैं खोल दूं
मन के वे तार जिससे बांधा गया है तुम्हे सदियों से
और अपनी सारी छटपटाहट के बवजूद
जिसे नहीं कर पा रही हो व्यक्त

प्यारी लड़की क्या तुम नहीं चाहती
कि तुम्हे देखा जाए तुम्हारे वजूद के साथ
कहो अब चुप्पी तोड़ो
या मुझे दो अनुमति
कि मैं खोल सकूं तुम्हारा मन …

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