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रोजाना एक कविता : तेजेंद्र शर्मा की चुनिंदा कविताएं जिनमें गूंजते हैं मानवाधिकार के स्वर

हिंदी के प्रवासी कवियों में एक विशेष स्थान रखने वाले तेजेंद्र शर्मा का आज जन्मदिवस है। कहानियों की प्रस्तुति इतनी मार्मिक और शानदार करते हैं कि लगता है कोई फ़िल्म चल रही है। लेकिन आपको जानकर ताज्जुब होगा कि कविता तेजेन्द्र शर्मा की प्रिय विधा है। वह जिस मन से कविताएँ और ग़ज़लें लिखते हैं उसी मन से उसे पढ़ते और गाते भी हैं। कहानी के अपेक्षा उन्होंने कविताएँ अपेक्षाकृत कम लिखी हैं लेकिन जो भी लिखी हैं, उनमें मानवीयता के स्वर दृष्टिगोचर होते हैं। उनकी कविताओं में मानवाधिकार के स्वर गूंजते हैं। प्रस्तुत है इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट की ‘रोजाना एक कविता’ श्रृंखला में तेजेंद्र शर्मा की चुनिंदा कविताएं।

डरे सहमे बेजान चेहरे

अपने चारों ओर
निगाह दौड़ाता हूँ,
तो डरे, सहमे, बेजान
चेहरे पाता हूं

डूबे हैं गहरी सोच में
भयभीत मां, परेशान पिता
अपने ही बच्चों में देखते हैं
अपने ही संस्कारों की चिता

जब भाषा को दे दी विदाई
कहां से पायें संस्कार
अंग्रेज़ी भला कैसे ढोए
भारतीय संस्कृति का भार!

समस्या खडी है मुँह बाये
यहां रहें या वापिस गांव चले जायें?
तन यहां है, मन वहाँ
त्रिशंकु! अभिशप्त आत्माएँ!

संस्कारों के बीज बोने का
समय था जब,
लक्ष्मी उपार्जन के कार्यों में
व्यस्त रहे तब!

कहावत पुरानी है
बबूल और आम की
लक्ष्मी और सरस्वती की
सुबह और शाम की

सुविधाओं और संस्कृति की लडाई
सदियों से है चली आई
यदि पार पाना हो इसके,
बुध्दम् शरणम् गच्छामि!

औरत को जमाने ने

औरत को ज़माने ने बस जिस्म ही माना है
क्या दर्द उसके दिलका कोई नहीं जाना है

बाज़ार में बिकती है घरबार में पिसती है
दिन में उसे दुत्कारें, बस रात को पाना है

मां बाप सदा कहते, धन बेटी पराया है
कुछ साल यहां रहके, घर दूजे ही जाना है

इक उम्र गुज़र जाती, संग उसके जो शौहर है
सहने हैं ज़ुलम उसके, जीवन जो बिताना है

बंटती कभी पांचों में, चौथी कभी ख़ुद होती
यह चीज़ ही रहती है, इन्सान का बाना है

बन जाती कभी खेती, हो जाती सती भी है
उसकी न चले मर्ज़ी बस इतना फ़साना है

सहमे सहमे आप हैं


मस्जिदें ख़ामोश हैं, मंदिर सभी चुपचाप हैं
कुछ डरे से वो भी हैं, और सहमें सहमें आप हैं

वक्त है त्यौहार का, गलियाँ मगर सुनसान हैं
धर्म और जाति के झगडे़ बन गये अब पाप हैं

रिश्तों की भी अहमियत अब ख़त्म सी होने लगी
भेस में अपनों के देखो पल रहे अब सांप हैं

मुंह के मीठे, पीठ मुड़ते भोंकते खंजर हैं जो
दाग़ हैं इक बदनुमा, इंसानियत पर, शाप हैं

राम हैं हैरान, ये क्या हो रहा संसार में
क्यों भला रावण का सब मिल, कर रहे अब जाप हैं

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