spot_img

रोजाना एक कविता : आज पढ़ें तुलाराम अनंत उत्सव की कविता काश

A poem a day

कभी यूँ हो
धरती पर मुरझाए पड़े सारे फूल
फिर से पेड़ पर लग जाएँ

समंदर का खारा पानी
उल्टा बह कर नदी बन जाएँ
फिर से मीठा हो जाएँ

पलकों पर तैरते कतरें
ख़ुशी में तब्दील हो जाएँ
आँखों में समा जाएँ

हम बुढ़ापा से जवानी और
जवानी से बचपन की और लौटें
फिर से निश्छल हो जाएँ

काश कभी यूँ भी हो
तुम लौट आओ कभी न जाने के लिए
और फिर से हम एक हो जाएँ

Explore our articles