
“बारूद के ढेर में दबी
भग्न प्रतिमाएँ झाँक-झाँककर
मानों मुँह चिढ़ा रही हैं
अब भी मुस्कुरा रहीं हैं
बुद्ध की पाषाण प्रतिमाएँ
ललकार रहीं हैं
सुनो! युयुत्सु
तुम्हारे गोले, बारूद और हथियारों
से कहीं ज्यादा ताकतवर है मेरी हँसी
तुम्हारी युद्ध भावना से
कहीं ज्यादा प्रबल हैं
मेरी प्रेमिल भावनाएँ…
घृणा से मिटाई जा सकती हैं
लौकिक चीजें
प्रेम अलौकिक विषय है…!”


