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रोजाना एक कविता : आज पढ़ें वसंत सकरगाए की कविता परछाइयां

प्रेमिकाओं को उन दरवाज़ों पर दस्तक नहीं देना चाहिए
जहां रहते हैं
उनके प्रेम में जहां हार चुके
उनके प्रेमी

माना कि एकतरफ़ा था प्रेम और उन्होंने
कभी प्रेम नहीं किया प्रेमियों से

माना कि प्रेमी को समझने में कुछ भूल हुई
भरोसा नहीं हुआ प्रेमियों पर कभी
लगा कि वे छल रहे हैं उन्हें
प्रेमियों की इस बात का सरासर ग़लत अर्थ निकाला
कि प्रेम की होती है सबसे बड़ी यह अच्छाई
कि प्रेमी-प्रेमिका की बने एक ही परछाई

आव देखा न ताव और उन्होंने
प्रेमियों के मुंह पर बंद कर दिया दरवाज़ा
प्रेमिकाएं भूल जाती हैं कि प्रेम-द्वार के
दोनों तरफ़ होती हैं कुंडियां

हालांकि अच्छी तरह जानती हैं प्रेमिकाएं
कि घाव भरते ही हारा हुआ और मरणासन्न राजा
हासिल कर ही लेता है खुद पर भरोसा और दल-बल
जीत ही लेता है खोया हुआ साम्राज्य
लेक़िन ऐसा होता नहीं प्रेमियों के साथ

प्रेम में हारे प्रेमी की
कभी नहीं बनती कोई परछाई
कि जिसे वे छू सकें और जिसमें छुप सके
कि प्रायश्चित में, भीतर ही भीतर
धंस रही हैं प्रेमिकाओं की बादामी आंखे
आलू-ककड़ी की परतें रखने नींबू-मलाई रगड़ने पर भी
मिट नहीं रहीं आंखों की कालिख
कि अब काला पड़ रहा है देह का संगमरमर
कि धीरे-धीरे दरक रही है उम्र की रेत
कि सालों से उदास पड़े सितार के झूले तारों पर
नहीं बजती फिर नई सरगम और अक्सर
तार टूट जाते हैं कसने की कोशिश में

चेहरे की बढ़ती झाइयों में बहुत मुश्क़िल होता है
तलाशना
प्रेमियों की परछाइयां

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