
यार को जाते हुए तब तक देखा
जब तक शेष रही उसकी छाया
जीवन में वह मोड़ जिसे सब मृत्यु कहते हैं
वहीं पर बिछड़े थे हम
मैं शमशान तक गया था उसके साथ
वहां अग्नि के रथ पर बैठ कर अनंत की यात्रा पर निकलना था उसे
मैं खड़ा खड़ा निहारता रहा उसे
आख़री बंधन से मुक्त होते हुए
हर तरह की छाया से छूटते हुए
निहारता रहा उसकी चिता में
न जाने देखते हुए क्या देख रहा था
बस इस तरह देख रहा था
जैसे किसी को आख़री बार देखा जाता है।


