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रोजाना एक कविता: आज पढ़िए बैंकर मुनींद्र वर्मा की कविता ‘मैं हूं कौन’

मैं अकसर सोचता हूं
मैं हूं कौन?
आखिर क्यों इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिलता..!
कैसे हो सकता है बिना उत्तर का प्रश्न
ज्ञानी बोलते हैं, ईश्वर ने बनाया है हर एक प्रश्न का उत्तर
बस हमें ढूंढना है, निरंतर

हाँ, मुझे लगता है कि आज मेरी खोज पूरी हुई
मैं कोई और नहीं हूं
मैं हूं एक आभारी

मैं हूं आभारी अपने माता -पिता का
जिन्होंने मुझे इस संसार में लाया
शिक्षा दीक्षा दी और परिवार का पाठ पढ़ाया
मैं बना उनके जीवन का उत्तराधिकारी
हाँ प्यारे मित्र, मैं हूं उनका आभारी

मैं हूं आभारी उस समाज का भी
जिसने सामंजस्य सिखाया
और जीने का अनुकूल तंत्र दिया
जिसने जीने का आधार दिया
हाँ, मैं हूँ आभारी

मैं हूँ आभारी शिक्षकों एवं शैक्षणिक संस्थानों का
जिन्होंने दिया इस जीवन का मूल ज्ञान
जो मैं बना उन्होंने बनाया
दिए ठोस संसाधन
हां, मैं हूँ इसका आभारी

मैं हूँ आभारी इस अर्थव्यवस्था और उसके संस्थानों का
जिससे चल रहा है जीवन
जो बना गृहस्थ जीवन का ठोस आधार
हां, मैं हूँ इसका भी आभारी

मैं हूँ आभारी अपने इकाई परिवार का,
जिसका मैं केंद्रबिंदु हूँ
जिसने नई जिम्मदारियों का एहसास कराया
इसी ने तो नश्वर मनुष्य के आगे बढ़ाने का आधार बनाया
हां, मैं हूँ इसका आभारी

मैं आभारी हूं अपने मित्रों, सहयोगियों एवं शुभचिंतकों का
जिन्होंने मेरे जीवन में रंग भरे
जिंदगी की दौड़ को आगे बढ़ाया
आभारी हूं इनका जिन्होंने
जीवन को हर आयाम दिया है।

मैं हूं आभारी अनगिनत लोगों और वस्तुओं का
जो शायद बाकी की श्रेणियों में न आते हैं
पर उतने ही महत्वपूर्ण हैं
वही तो इस दुनिया के पूरक हैं
हाँ, मैं हूँ इनका आभारी

शायद हम सभी इंसानों का एक ही परिचय है
कि हम सभी आभारी हैं
आभार व्यक्त करें या न करें,
हाँ, हम सभी आभारी है

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