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New Delhi : उमर खालिद ने जमानत याचिका खारिज होने पर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की

New Delhi: Umar Khalid Files Review Petition in Supreme Court Following Rejection of Bail Plea

नई दिल्ली : (New Delhi) दिल्ली दंगों की साजिश रचने के आरोपित उमर खालिद ने उच्चतम न्यायालय में जमानत याचिका खारिज करने के आदेश को चुनौती देते हुए पुनर्विचार याचिका दायर की है। सोमवार को उमर खालिद की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने जस्टिस अरविंद कुमार (Justice Arvind Kumar) की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष मेंशन किया। सिब्बल ने इस मामले की सुनवाई खुली अदालत में करने की मांग की। उच्चतम न्यायालय ने खुली अदालत में सुनवाई की मांग पर कोई आदेश तो नहीं दिया लेकिन विचार करने का भरोसा दिया।

पांच जनवरी को उच्चतम न्यायालय ने उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। उच्चतम न्यायालय ने उमर खालिद और शरजील इमाम (Umar Khalid and Sharjeel Imam) की जमानत याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा था कि कथित साजिश में दोनों की भूमिका दूसरे आरोपितों से अलग है। कोर्ट ने कहा था कि दोनों आरोपितों की भूमिका साजिश रचने के मामले में आर्किटेक्ट की तरह है।

उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया था कि वो एक साल के अंदर सभी गवाहों के बयान दर्ज कराएं। कोर्ट ने कहा था कि सभी गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद उमर खालिद और शरजील इमाम जमानत के लिए दोबारा अर्जी दे सकते हैं। कोर्ट ने कहा था कि दोनों आरोपितों की इस साजिश में केंद्रीय भूमिका है। कोर्ट ने कहा था कि दोनों आरोपित भले ही लंबे समय से हिरासत में हैं लेकिन इससे किसी भी संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन नहीं होता है। उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि देश की सुरक्षा और अखंडता के आरोप वाले मामलों में ट्रायल में देरी को तुरुप के पत्ते की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा था कि अनुच्छेद 21 संवैधानिक व्यवस्था में एक खास जगह रखता है। ट्रायल से पहले हिरासत को सजा नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा था कि यूएपीए की धारा 15 के तहत सुरक्षा को खतरा पहुंचाने के इरादे से और आतंक फैलाने के इरादे से किया गया कार्य आतंकी गतिविधि के तहत आता है। कोर्ट ने कहा था कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि हर आरोपित एक ही स्थिति में नहीं है। कोर्ट को प्रत्येक याचिकाकर्ता का व्यक्तिगत रूप से मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। अनुच्छेद 21 के तहत राज्य को लंबे समय तक प्री-ट्रायल हिरासत (pre-trial detention) को सही ठहराना होगा।

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