
सुप्रीम कोर्ट ने तलाशी और जब्ती के प्रावधानों को सही ठहराया
नई दिल्ली : (New Delhi) सुप्रीम कोर्ट ने आयकर अधिकारियों को ‘तलाशी और जब्ती’ की शक्ति देने वाले कानूनी प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है। अदालत ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी कानून को सिर्फ इस डर से असंवैधानिक नहीं माना जा सकता कि उसका गलत इस्तेमाल हो सकता है।
आशंका के आधार पर कानून रद्द नहीं होता
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने साफ कहा कि किसी भी नियम का ‘संभावित दुरुपयोग’ उसे असंवैधानिक बनाने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने तर्क दिया कि ये प्रावधान उन लोगों के लिए हैं जो बड़े पैमाने पर कर चोरी करते हैं, और कानून को केवल ‘डर’ के आधार पर नहीं परखा जा सकता।
सर्च के ‘कारण’ बताना जरूरी, पर कब?
याचिकाकर्ता की मुख्य चिंता यह थी कि आयकर अधिकारियों को सर्च के कारण ट्रिब्यूनल या करदाता को तुरंत बताने से छूट दी गई है। इस पर कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत अधिकारियों को ‘विश्वास करने के कारणों’ को लिखित में रिकॉर्ड करना पड़ता है। सवाल सिर्फ यह है कि ये कारण किस समय या किस चरण पर बताए जाने चाहिए।
डिजिटल युग और नोटिस की चुनौती
10 फरवरी की पिछली सुनवाई का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि आज के डिजिटल युग में अगर तलाशी से पहले नोटिस दिया गया, तो जांच शुरू होने से पहले ही सबूत मिटाए जा सकते हैं। इससे पूरी जांच का मकसद ही खत्म हो जाएगा। अदालत का मानना है कि अधिकारियों की शक्तियाँ ‘अनियंत्रित’ नहीं हैं, वे कानून के दायरे में हैं।
नया आयकर अधिनियम 2025 भी रडार पर
याचिका में आयकर अधिनियम 1961 की धारा 132 के साथ-साथ नये आयकर अधिनियम 2025 की धारा 247 को भी चुनौती दी गई थी, जो 1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाला है। याचिकाकर्ता का आरोप था कि ये धाराएं अधिकारियों को ‘अत्यधिक शक्ति’ देती हैं, जिससे तीसरे पक्ष (Third party) भी बेवजह लपेटे में आ सकते हैं।
याचिका वापस ली, सरकार को देंगे प्रतिवेदन
कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए याचिकाकर्ता के वकील संजय हेगड़े ने याचिका वापस ले ली। हालांकि, बेंच ने उन्हें यह छूट दी कि वे कानून में बदलाव या स्पष्टीकरण के लिए केंद्र सरकार के सामने अपना पक्ष रख सकते हैं।


