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Washington : अमेरिकी अर्थव्यवस्था के डगमगाने के बीच 60 से अधिक देशों पर ट्रंप का टैरिफ प्रभावी

भारत पर 25 प्रतिशत शुल्क का पहला चरण लागू, दूसरा 27 अगस्त से आ जाएगा प्रभाव में
वाशिंगटन : (Washington)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (US President Donald Trump) के टैरिफ से महीनों से जारी उठापटक का आर्थिक असर साफ दिख रहा है। देश की डगमगा रही अर्थव्यवस्था के बीच 60 से अधिक देशों और यूरोपीय संघ पर आयात पर राष्ट्रपति की निर्धारित की गई टैरिफ (शुल्क) दर आज से प्रभावी हो गई। इसी के साथ भारत से आयात पर घोषित 25 प्रतिशत शुल्क का पहला चरण भी प्रभावी हो गया।

सीबीएस न्यूज के अनुसार, व्हाइट हाउस ने कहा कि मध्यरात्रि (पूर्वी समयानुसार) के ठीक बाद से 60 से ज्यादा देशों और यूरोपीय संघ के उत्पादों पर 10 प्रतिशत या उससे अधिक की टैरिफ दरें लागू हो गईं। यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया के उत्पादों पर 15 प्रतिशत कर लगाया गया है। ताइवान, वियतनाम और बांग्लादेश से आयात पर 20 प्रतिशत कर प्रभावी हो गया। ट्रंप को उम्मीद है कि यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश अमेरिका में अरबों डॉलर का निवेश करेंगे।

राष्ट्रपति ने व्हाइट हाउस (White House) की इस घोषणा के फौरन बाद ट्रुथ सोशल पर लिखा, “आधी रात हो गई है!!! अरबों डॉलर के टैरिफ अब संयुक्त राज्य अमेरिका में आ रहे हैं!” व्हाइट हाउस ने पिछले हफ्ते घोषणा की थी कि भारत को 25 प्रतिशत शुल्क का भुगतान करना पड़ेगा। इसके बाद ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए। इस आदेश में लगभग 60 देशों के लिए शुल्क दरों की घोषणा की थी। इस 25 प्रतिशत शुल्क के अलावा ट्रंप ने कल भारत पर रूसी तेल की खरीद को लेकर और 25 प्रतिशत शुल्क और लगा दिया। इसके बाद भारत पर कुल शुल्क 50 प्रतिशत हो गया है। यह किसी भी देश पर लगाए गए सबसे अधिक शुल्क में से एक है। यह अतिरिक्त टैरिफ 27 अगस्त से प्रभावी होगा।

ट्रंप और व्हाइट हाउस को विश्वास है कि इस टैरिफ की शुरुआत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की दिशा के बारे में स्पष्टता प्रदान करेगी। प्रशासन का मानना है कि वह नए निवेश को बढ़ावा दे सकता है। बावजूद इसके अमेरिका को खुद पर लगे जख्मों के संकेत मिल रहे हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि अप्रैल में राष्ट्रपति के टैरिफ की प्रारंभिक शुरुआत के साथ अमेरिकी अर्थव्यवस्था में गिरावट आई। इससे बाजार में हलचल मच गई। इसके बाद बातचीत का दौर चला और ट्रम्प ने 07 अगस्त से सार्वभौमिक टैरिफ लागू करने का अंतिम फैसला लिया।

डायनेमिक इकोनॉमिक स्ट्रैटेजी (CEO of Dynamic Economic Strategy) के सीईओ जॉन सिल्विया ने कहा कि अप्रैल के बाद आर्थिक रिपोर्टों से पता चला कि भर्तियां रुक गई हैं। मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ गया और प्रमुख बाजारों में गिरावट शुरू हो गई। सिल्विया ने एक विश्लेषण नोट में कहा, “कम उत्पादक अर्थव्यवस्था में कम श्रमिकों की आवश्यकता होती है। लेकिन इससे भी अधिक ऊंची टैरिफ दरें श्रमिकों के वास्तविक वेतन को कम करती हैं। अर्थव्यवस्था कम उत्पादक हो गई है, और कंपनियां पहले जैसा वास्तविक वेतन नहीं दे सकतीं।” उन्होंने कहा कि टैरिफ के असल प्रभाव का असर दिखने में वर्षों लग सकते हैं।

ट्रंप ने टैरिफ को लगातार व्यापार घाटे को कम करने के एक उपाय के रूप में देखा है। लेकिन आयातकों ने करों के लागू होने से पहले ही अधिक वस्तुओं का आयात करके करों से बचने की कोशिश की है। परिणामस्वरूप, वर्ष की पहली छमाही में 582.7 बिलियन डॉलर का व्यापार असंतुलन 2024 की तुलना में 38 फीसद अधिक रहा। पिछले वर्ष की तुलना में कुल निर्माण व्यय में 2.9 फीसद की गिरावट आई है। फैक्टरी के कामगारों के सामने वास्तव में बेरोजगारी का संकट बढ़ गया है।

बड़ी बात यह है कि ट्रंप कंप्यूटर चिप्स पर 100 फीसद टैरिफ लगाने की घोषणा कर चुके हैं। राष्ट्रपति के टैरिफ लगाने के लिए आर्थिक आपातकाल घोषित करने वाला 1977 के एक कानून का इस्तेमाल भी चुनौती के घेरे में है। पिछले हफ्ते अमेरिकी अपील अदालत में सुनवाई भी हो चुकी है। फैसला आना बाकी है, लेकिन न्यायाधीश कह चुके हैं कि ट्रंप ने अपने अधिकार का अतिक्रमण किया है। यहां तक कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में उनके साथ काम करने वाले लोग भी इस बात को लेकर संशय में हैं कि अर्थव्यवस्था सुचारू रूप से आगे बढ़ेगी। पूर्व रिपब्लिकन हाउस स्पीकर पॉल रयान इस समय ट्रंप के मुखर आलोचक के रूप में उभरे हैं।

रयान ने कहा, ” राष्ट्रपति अपनी सनक के आधार पर टैरिफ बढ़ाना चाहते हैं। मुझे लगता है कि आगे कुछ उतार-चढ़ाव भरे हालात होंगे। उन्हें कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।” उधर ट्रंप को आर्थिक उछाल की उम्मीद है। द सेंचुरी फाउंडेशन की वरिष्ठ फेलो रेचल वेस्ट ने कहा, “एक व्यक्ति है जो खुद पैदा की जा रही अनिश्चितता को लेकर लापरवाह हो सकता है और वह हैं डोनाल्ड ट्रंप। बाकी अमेरिकी पहले से ही इस अनिश्चितता की कीमत चुका रहे हैं।” रेचल, बाइडेन के व्हाइट हाउस में श्रम नीति पर काम कर चुकी हैं।

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