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प्रतिध्वनि

सुने वन-जंगल में कोई रोये-चीखे जब हैवान
गूंज उठे यदि तुरही कोई या आये भारी तूफ़ान
कहीं किसी टीले के पीछे गाये युवती मधुमय गान –
सब ध्वनियों का शून्य पवन में
निर्मल-निर्मल नील गगन में,

तुम देती उत्तर, प्रतिदान ।

गूंज-गरज मेघों की सुनतीं, जिनसे बहरे होते कान
वात-बवंडर को सुनती हो, लहरों की हलचल, तूफ़ान
तुम गांवों के चरवाहों की हांक, शोर, सुनती आह्वान
तुम सबको ही देतीं उत्तर
किन्तु नहीं पातीं प्रत्युत्तर,
तेरा, कवि का भाग्य समान!

पुश्किन
रशियन कवि

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