
पत्नी पुष्पा भारती को लिखे गए धर्मवीर भारती के इस पत्र में संपूर्ण औदात्य के साथ वह आस्वाद भी है, जिसे साहित्य कहा जाता है। एक-एक शब्द की यात्रा के साथ यह अहसास पुष्ट से पुष्टतर होता जाता है कि इस संपदा में केवल प्रेमोद्वेग ही नहीं, विचारोद्वेग भी भरपूर है।
जितने तुम मेरे हो…
रविवार 24 नवम्बर, 1957
लेकिन उस समय यह सब मैं थोड़े ही जानता था, जब किसी ने कान के बहुत पास, इतने पास कि नम और कांपते होठों की आर्द्रता और उष्णता को मैं खूब महसूस कर रहा था – इतने पास, किसी ने कितने डूबे स्वर में कहा था, ‘जितने तुम मेरे हो उतने किसी के नहीं।’ उस समय तो सिर्फ इतना हुआ था कि मुझे लगा था कि पिघले हुए गुनगुने उल्लास की एक गहरी गुलाबी लहर कर्णमूलों के पास से छहरती हुई, कंठ में होती हुई, वक्ष को अदर से चीरती हुई पांवों तक उतरती चली जा रही थी – सारा शरीर मेरा पीपल के पत्ते-सा कांप उठा था – इतना हुआ था, केवल इतना ! और एक अजीब-सी मूर्च्छना !
पर एक आभास मेरे उस विभोर तन्मय मन को उस समय भी हो गया था कि आज कुछ ऐसा हुआ है जो आज तक कभी मेरे जीवन में घटित नहीं हुआ है। इसी जीवन में नहीं जन्म-जन्मांतर में यह कुछ है जो पहली बार और अंतिम बार घटित हो रहा है। कोई गांठ है जो इतने जन्म जी लेने के बाद भी नहीं खुली थी – आज, आज प्राणपण का बल लगाकर किसी ने यह गांठ ढीली कर दी, खोल दी – कोई अदृश्य परिधि थी जो आज तक नहीं टूटी थी, किसी ने हल्की थाप से उसे खोल दिया – और मैंने देखा अजीब गैलरी है, द्वार के अंदर द्वार खोलकर कोई चलता चला जा रहा है, अंदर-अंदर और अंदर। ऐसा मैंने कभी नहीं जाना था – कभी नहीं।
ऐसा नहीं कि पहले कभी ममता नहीं दी। अशेष ममता दी। ऐसी जो आज भी चुकाए नहीं चुक्ती, लौट-लौट कर छा लेती थी – पर यह आभास बना रहा कि यह जिसे ममता दे रहे हैं यह कोई है मेरा अत्यंत प्रिय – जो मुझसे छिन गया है, मुझसे दूर है, कैसे उसे हाथ बढ़ा कर छू लूं। पर हाय! यह अनुभूति तो कभी हुई नहीं थी इन हाथों को बढ़ाकर छुऊं किसे? इन हाथों में, इनके रोम-रोम में इनके -कण में और है कौन? इन नसों में अब कौन कहता है कि स्वर्ण रक्त बहता ? रिल्के ने सिर्फ कहा था ‘यदि मेरी दृष्टि, मेरे श्रवण, मेरे हाथ, मेरा हृदय सब कुछ छीन लो तो मैं अपने रक्त के प्रवाह में तुम्हें धारण करूंगा -पर आज मैं जानता हूं कि मेरे रक्त की बूंद-बूंद कोई और है ही नहीं, सिवा उसके जिसने कहा था कि ‘जितने तुम मेरे हो…
भा.
प्रकृति उपदेश देने से अधिक सिखाती है। शिलाओं पर धर्मोपदेश नहीं लिखे होते, पत्थरों से नैतिकता की बातें निकालने से आसान है चिंगारी निकालना। – जॉन बर्रोज़


