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वेनिएमिन केवरिन का पत्र फेदिन के नाम

‘द टू केप्टिन’ नामक चर्चित उपन्यास के लेखक वेनिएमिन केवरिन ने 1968 में कोस्तासिन फेदिन को उचित और अनुचित का बोध कराने के उद्देश्य से यह पत्र लिखा, क्योंकि वे सोवियत लेखक यूनियन के शीर्ष पर बैठे दिन को साहित्य जगत का खलनायक बनने से रोकना चाहते थे।

तुम स्वार्थवश उनका साथ दे रहे हो

फेदिन,
हम अड़तालीस वर्षों से एक-दूसरे को जानते हैं। जवानी में हम दोस्त थे, इसलिए हमें एक-दूसरे को जज करने का अधिकार है। अधिकार से भी अधिक यह एक कर्तव्य है। तुम्हारे पुराने मित्र हैरान हैं कि हाल की अविस्मरणीय घटनाओं के दौरान तुम्हारी जो भूमिका रही, उसके पीछे क्या कारण थे, जिन्होंने कुछ को फौलाद बना दिया है, कुछ को सच्ची कला से बहुत दूर गुलाम अफसर बना दिया है।

पास्तरनाक के उपन्यास (डॉ. जिवागो) की करुण गाथा कौन नहीं जानता? जिसने हमारे देश के साहित्य को बहुत क्षति पहुंचाई है। इसमें तुम्हारी भूमिका ऐसी रही है, जैसे तुम्हें बाध्य किया गया हो कि तुम उस बेचारे कवि की मृत्यु के बारे में कुछ नहीं जानते। जो कभी तुम्हारा मित्र था और तेईस साल से तुम्हारे बगल के मकान में रह रहा था। शायद तुमने तब भी कुछ नहीं देखा, जब एक हजार से अधिक लोग उसका ताबूत कफनाने जा रहे थे और तुम्हारे दरवाजे के सामने से निकल रहे थे।

यह कैसे हुआ कि तुमने हमारे उदारवादी पत्र ‘लिट्रेरी मास्को’ को सिर्फ कोई मदद नहीं दी (जो हमारे साहित्य के लिए जरूरी था लेकिन उस फ़िल्म एक्टर के घर, 1500 लेखकों के सामने इसके प्रकाशन की पैरवी की थी। उसी समय तुम अपनी जेब में हमसे गद्दारी का लिखित भाषण रखे हुए थे और हमारे काम की सराहना कर रहे थे।

सिर्फ़ इतना नहीं, लेकिन इस पत्र में तुम्हारी हरकतों की बैलेंस-शीट बनाने नहीं जा रहा। साहित्य में तुम्हारी स्थिति ने हमें एक सूत्र में बांध दिया है। तुम्हारे अधःपतन की खोज में किसी को बहुत दूर नहीं जाना होगा। साल-दर-साल तुममें बदलाव आते रहे हैं। तुम्हारी हरकतों से एक बार फिर साहित्य की हानि हो रही है।

क्या तुम नहीं समझते कि सोल्जेनित्सिन के उपन्यास ‘केसरवार्ड’ के प्रकाशन से हमारे साहित्य का तनाव दूर होता, साहित्य में जन-आस्था लोटती तथा अन्य पांडुलिपियों के प्रकाशन का मार्ग प्रशस्त होता, अलेक्जेंडर बेक की पांडुलिपि सुरक्षित है। पहले इसे छापने की इजाजत थी, अब नहीं है। हालांकि हमारे बड़े साहित्यकारों ने इसकी प्रशंसा की है। हालात ये हैं कि रूस के हर गंभीर लेखक की मेज की दराज में एक पांडुलिपि रखी हुई है, जिन्हें बिना कारण बताए नहीं छापा गया, लेकिन तमाम वर्जनाओं के बावजूद सही, आत्मिक-साहित्य लिखा जा रहा है, जो हमारे देश की आध्यात्मिक धरोहर है, जिसकी अज देश को जरूरत है। क्या तुम नहीं जानते कि विराट घटनाओं को साहित्यिक स्वरूप की जरूरत होती है और तुम उनका साथ दे रहे हो जो स्वार्थवश इस अनिवार्य प्रक्रिया को रोकने की कोशिश कर रहे हैं…?

तोलतोय और चेखव की परंपरा पर चलने वाले लेखक से ऐसी उम्मीद करना हास्यास्पद है, लेकिन इसका एक और अर्थ है, तुम बिना समझे अपने ऊपर एक भारी जिम्मेदारी ले रहे हो। एक लेखक जिसने दूसरे लेखकों के गले में फांसी के फंदे डाले हैं, साहित्य के इतिहास में अपने लेखन से नहीं, अपने कारनामों से जाना जाएगा। तुम समझ नहीं पा रहे हो कि तुम लेखक जगत में एक खलनायक के रूप में उभर रहे हो।

इससे सिर्फ एक ही तरह से बचा जा सकता है कि तुममें इतना साहस हो कि अपने निर्णय बदल सको। तुम समझ सकते हो, ऐसा पत्र लिखना, मेरे लिए कितना मुश्किल है, लेकिन मुझे चुप रहने का कोई अधिकार नहीं।

वेनिएमिन केवरिन
(सर्वे. नं. 68. जुलाई, 1968)

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