
मैं यह सब जानता हूं
क्लारा वेस्टफ़ मूर्तिकार थी और रिल्के कवि। क्लारा से उनकी मुलाकात उस दौरान हुई, जब वे वॉर्पस्वीडे की एक आर्टिस्ट कॉलोनी में रुके। 1901 में वे दोनों जीवन भर के लिए एक-दूसरे के साथ बंध गए।
कैफ्री
22 फरवरी, 1907
प्रिये,
मैं इन थोड़े-से शब्दों में तुम्हारे पांचवें पत्र के लिए धन्यवाद देता हूं। मैं तुम्हारे रंज को अच्छी तरह समझ सकता हूं और स्वयं उसे अनुभव कर सकता हूं, क्योंकि मैं उससे बहुत अच्छी तरह परिचित हूं। इस रंज का कारण ढूंढ निकालना असंभव है। यह और कुछ नहीं, हम लोगों के दिलों में उपस्थित एक ऐसी दर्दीली जगह है जो जब दर्द करती है तो पता ही नहीं चलता कि दर्द हो कहां रहा है, इसलिए हम समझ नहीं पाते कि आखिर इस खामोश, पर भरे दिल को हम कैसे समझें और कैसे इसका इलाज करें? मैं यह सब जानता हूं। इस रंज के समान ही एक ख़ुशी की अनुभूति भी है। काश! इन दोनों चीजों से हम समान रूप से दूर रहें। दोनों में से हमारी अपनी कोई भी नहीं है और कभी-कभी हम कहीं खड़े होते हैं और बाहर की हवा या प्रकाश या पक्षी के संगीत का एक स्वर हमें कहीं ले उड़ता है और हमसे अपनी मर्जी करा लेता है। यह सब देखना-सुनना और ग्रहण करना तो ठीक है, इसके प्रति जड़ होना भी उचित नहीं, लेकिन बिना इसमें पूरी तरह डूबे हुए ही हमको इसके सब स्तरों का अधिक से अधिक गहराई से अनुभव करना चाहिए। वसंत के उन्माद से भरे एक अप्रैल के दिन मैंने रोडिन से कहा था, ‘कैसे यह चीज तुम्हारे खंड-खंड कर डालती है, कैसे तुम्हें अपनी सारी शक्ति बटोरकर काम में लगना पड़ता है और जब तक चूर-चूर न हो जाओ, संघर्ष करना पड़ता है? क्या तुम भी ऐसा ही महसूस नहीं करते?’ और उसने, जो निश्चय ही वसंत के असर को जानता-समझता था, मेरी ओर एक तेज़ नज़र फेंककर कहा था, ‘आह! इसकी तरफ ध्यान मत दो।’ यही हमें करना पड़ता है…. कुछ बातों की तरफ हमें बिल्कुल भी ध्यान नहीं देना चाहिए… हमें अपने अंतःकरण की इन दर्दीली जगहों के प्रति एकाग्र और सचेत रहना चाहिए, क्योंकि अपने पूरे व्यक्तित्व से भी हम इस दर्द को समझ नहीं सकते। अपनी पूरी जीवनी-शक्ति से हर चीज़ को अनुभव करने पर भी बहुत कुछ बाकी रह जाता है और वही सबसे महत्वपूर्ण है।
रिल्के


